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अंक विद्या-भाग ५

Updated: Aug 29, 2023

सद्गुरु कृपा रहस्यम् और अंक विद्या के नये प्रयोग


विगत कुछ समय में मुझे कुछ प्रश्नों से बार - बार दो-चार होना पड़ा है जो सदगुरुदेव का ही एक संकेत है कि इस विषय पर तर्कसंगत रुप से अपने विचार सबके समक्ष रखे जाने ही चाहिए -


कुछ प्रश्न हैं, यथा -

  1. मैं अमुक मंत्र की सिद्धि करना चाहता हूं, कैसे करुं?

  2. मैं बहुत परेशान चल रहा हूं, जो कार्य करना चाहता हूं उसमें सफलता ही नहीं मिलती । क्या करुं?

  3. मैं अपने जीवन में इस कार्य को करना चाहता हूं, ऐसी कौन सी साधना की जाए जिससे सफलता मिले ही ।


सवालों की लिस्ट तो इतनी बड़ी है कि एक पूरी पोस्ट ही लिखनी पड़ेगी उन पर । पर आशय आप समझ ही गये होंगे ।


एक बात आप जान लीजिए कि सदगुरुदेव तो देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं । पर हमारी झोली अगर फटी निकले तो उसमें वो क्या कर सकते हैं । वैसे अब इस बात का ज्ञान कैसे किया जाए कि सदगुरुदेव हमेशा देने के लिए कैसे तैयार रहते हैं? आखिर प्रमाण क्या है इस बात का?


मैं भी हमेशा यही कहता हूं कि बिना प्रमाण के कोई बात मानी भी नहीं जानी चाहिए । प्रमाण मिले तभी मानना चाहिए कि सदगुरुदेव तो हमेशा देने के लिए तैयार रहते हैं । अब चाहे आपकी झोली फटी हो या नहीं, उससे क्या फर्क पड़ता है । फर्क तो इस बात से पड़ता है कि सदगुरुदेव हमें कुछ देते भी हैं या नहीं । अब ये बात अलग है कि जो कुछ भी सदगुरुदेव हमें देते हैं हम उसे संभाल भी पाते हैं अथवा नहीं ।


इस बात को हममें से अधिकांशतः ने कभी न कभी कहा ही है कि - हमने तो पर्याप्त संख्या में मंत्र जप भी किया, साधनायें भी की हैं, अनुभूतियां भी हुयी हैं पर काम नहीं होते हैं । जो समस्या चली आ रही थी, वह आज भी चली आ रही है । तो, इसका मतलब तो यही हुआ न, कि जो गड़बड़ी है वह गुरुजी में हैं, हममें नहीं । क्योंकि, हमने तो साधना की थी, अब गुरुजी कुछ फल देते ही नहीं हैं तो हम क्या करें" । अगर कोई ज्यादा गुस्से वाला हुआ तो ये भी कह सकता है कि ये साधना - वाधना कुछ नहीं है, सब बकवास है, कुछ नहीं होता ये सब करने से ।


इस तरह की सोच रखने से होगा तो कुछ नहीं, बल्कि हमारे अंदर ही एक नकारात्मक प्रवृत्ति आने लग जाती है, जब ये प्रवृत्ति ज्यादा बढ़ जाती है तो समाज में भी एक नकारात्मक संदेश ही जाता है कि ये सब पाखंड है । इससे कुछ होता जाता है नहीं, बस माला लेकर बैठे रहो ।


अब आप ये सोचो कि उस गुरु को कितनी पीड़ी होती होगी यह सब देखकर, जिसने अपने पूरे जीवन को इसमें खपा दिया, साधना रुपी हीरे - मोती मुफ्त में ही अपने शिष्यों के बीच ही बिखेर दिये, इतना महत्वपूर्ण ज्ञान ग्रंथों और रिकॉर्डिंग के माध्यम से सुरक्षित करके रख दिया कि जब मैं सशरीर न रहूं, तब भी मेरा दिया हुआ ज्ञान लाखों - करोड़ों शिष्यों के अंधकारमय जीवन में प्रकाश की किरणों के समान होगा ।


कहने को तो आप कुछ भी कहते रहें, गुरु के ज्ञान को आत्मसात करने के लिए कम से कम 2 गुण मनुष्य के अंदर होने चाहिए -


आज्ञा पालन


एक साधक या शिष्य के लिए गुरु आज्ञा सबसे ऊपर होती है । लेकिन उस स्तर तक पहुंचने में समय लगता है जब हम गुरु के कहे हुये एक वचन पर अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जाते हैं ।


आज्ञा पालन के विषय में हमारा विचार


शुरुआत में हम गुरु की आज्ञा का पालन अपनी सुविधा के हिसाब से करते हैं । जब हमें लगता है कि ये हमसे हो सकता है और हमारा कोई काम खराब किये बिना ही गुरु की आज्ञा का पालन किया जा सकता है तो हम कर देते हैं । नहीं तो हम चुपचाप किनारे हो जाते हैं कि, जब कुछ कहेंगे ही नहीं तो गुरुजी अपने आप बोलना बंद कर देंगे । तो, गुरुजी भी चुपचाप मुस्कुराते हुये आपको वही काम बताते हैं जो आप सच में कर पायेंगे । वैसे, एक वजह ये भी होती है कि क्यों हमारा अपने गुरु के साथ प्राणों का संबंध नहीं बन पाता है - क्योंकि हम ये जान ही नहीं पाते कि गुरु की आज्ञा के पीछे मर्म क्या है और क्यों उन्होंने हमें किसी कार्य को करने के लिए कहा है ।


सामान्य साधक को मंत्रों की अपार शक्ति का लेशमात्र भी अहसास नहीं होता है । साधना बेशक हम ही करते हैं लेकिन गुरु ही इस बात का निर्णय करते हैं कि कितनी ऊर्जा साधक को दी जाए जिससे शरीर उस ऊर्जा का आत्मसात कर सके । अगर गुरु बीच में न हों तो मंत्र की ऊर्जा इस शरीर को नष्ट भी कर सकती है और, जब शरीर ही नहीं रहेगा तो साधना कैसे करेंगे । इसीलिए पहले गुरु धारण किये जाते हैं और उसी के बाद साधना की जाती है । गुरु ही आध्यात्मिक जगत के अधिष्ठाता हैं - उन्हीं की आज्ञा से कोई भी साधक साधना में प्रवत्त होता है और अभ्यास करता है । एक सामान्य साधक आसानी से आध्यात्मिक जगत की जटिलता को नहीं समझ पाता है, इसलिए अगर वह साधारण रुप से भी गुरु आज्ञा का पालन करते हुये अपनी साधना में लगा रहता है तो भी उसका कल्याण निश्चित है ।


ज्यादातर लोग इस बात से परिचित तो हैं ही कि इस पूरी सृष्टि का कार्य देवी-देवताओं के अधीन है और, सभी देवता मंत्रों के अधीन हैं । और, मंत्र, वो तो केवल गुरु ही प्रदान कर सकते हैं । क्योंकि गुरु जिस मंत्र को प्रदान करते हैं वह उसे अपने प्राणों से घिसकर देते हैं, वह मंत्र उनकी प्राण ऊर्जा से आपूरित होता है और, इससे भी बढ़कर जो मंत्र गुरुमुख से प्राप्त होता है वह निष्कीलित होता है । भगवान शिव ने सभी मंत्रों को कीलित किया हुआ है । कीलन का मतलब है कि कोई एक अक्षर कम कर दो या बढा दो, हो गया कीलन । जब मंत्र पूर्ण ही नहीं होगा तो फल कहां से प्राप्त होगा ।


लेकिन जब गुरु किसी मंत्र को प्रदान करते हैं तब वह मंत्र पूर्ण शुद्ध होता है, निष्कीलित होता है और सबसे बढ़कर ऊर्जा युक्त होता है । ऐसे मंत्रों की साधना से ही जीवन में सफलता प्राप्त हो पाती है । अगर आप किताबों में पढ़कर मंत्र साधना करते हैं तो समझ जाइये कि आपको कितनी सफलता प्राप्त हो सकेगी ।


यहां हमें ये भी सोचना होगा कि गुरु तो हमको इतना दुर्लभ और महत्वपूर्ण ज्ञान प्रदान कर देते हैं पर हम गुरु की आज्ञा का कितना पालन करते हैं? क्या हमें ये नहीं जानना चाहिए कि आखिर गुरु जब हमें मंत्र प्रदान करते हैं तो हम उसके कितने हकदार हैं? ये भी कि हकदार हैं भी या नहीं । क्या हम उनके दिये हुये ज्ञान की महत्ता को समझ भी पाये हैं? क्या हमारे मन में उनके कहे हुये वाक्यों के प्रति विश्वास है, आदर है, श्रद्धा है?


अगर नहीं हैं तो फिर रोने से क्या लाभ । अगर हमारे मन में गुरु के प्रति विश्वास ही नहीं है तो फिर ये आध्यात्मिक जगत भी हमारे लिए नहीं है ।


सेवा भाव


आज के इस भाग-दौड़ के युग में किसी से सेवा-भाव की आशा की जाए तो ये कुछ ऐसा ही है जैसे आप सागर की गहराइयों से मोती निकालने की बात कर रहे हैं । सब कुछ इतना फास्ट और फटाफट होने लगा है कि इधर आप पैसा दीजिए, उधर आपका काम हो जाएगा । तो सेवा करने के लिए कहने की बात ही बेमानी है । ज्यादातर साधक जब किसी साधना शिविर में पहुंचते हैं तो सीधे ही शक्तिपात दीक्षा ग्रहण करने के लिए अग्रसर हो जाते हैं । दीक्षा की न्यौछावर राशि भी सदगुरुदेव ने कभी ज्यादा नहीं रखी है । आज के युग में भी उच्च कोटि की दीक्षा आपको रु. 1500 - 3000 में प्राप्त हो सकती है ।


पर आज भी ज्यादातर साधक यही शिकायत करते हुये मिलते हैं कि हमने इतनी दीक्षायें ली हैं, इतने पैसे खर्च कर दिये, लेकिन काम कोई बनता ही नहीं है । इतनी दीक्षायें ली हैं कि कंगाल ही हो गये होते । वो तो अच्छा रहा कि समय पर कट लिए, नहीं तो गुरुजी कहीं का नहीं छोड़ते ।


सेवा भाव के विषय में हमारा विचार


बड़ा ही मुश्किल होता है इस प्रकार के साधकों को समझाना । दरअसल जब भी कोई दीक्षा प्राप्त करनी होती है तब उसके मूल में एक भाव होता है - अपने गुरु की सेवा करना, उनको प्रसन्न करना, विभिन्न साधनाओं के अभ्यास से अपने शरीर को तैयार करना और, तब जाकर गुरु से दीक्षा की याचना करना । इतना करने के बाद जब गुरु दीक्षा देते हैं तब हम न सिर्फ उसकी ऊर्जा को आत्मसात कर पाते हैं बल्कि, हम अत्यंत कम समय में ही अपने इष्ट को भी प्रत्यक्ष कर सकते हैं ।


अब आप कह सकते हैं कि अब नौकरी करें, घर-बार देखें या जाकर गुरु की सेवा करें? और, वैसे भी सब लोग तो जाकर गुरु की सेवा नहीं कर सकते । हालांकि, जो लोग ऐसा कर सकते हैं, वो भाग्यशाली होते हैं । पर जो ऐसा नहीं कर सकते उनका क्या?


यहां हमें मूल भाव को समझने की आवश्यकता है । जब समस्त सृष्टि ही गुरु के हस्तगत है तो प्रत्येक कार्य भी गुरु का ही है । अब चाहे आप उसे परिवार का पालन-पोषण कहें, नौकरी करना कहें, जीवन के आवश्यक कार्य कहें, साधना कहें, तपस्या कहें । ये सब कार्य भी तो गुरु के ही हैं । यहां अगर आप अपने मन में सेवा भाव ले आयें और इस भावना से कार्य करें कि मैं जो भी कार्य कर रहा हूं, वह तो गुरु का ही कार्य है और मैं गुरु के हाथ, आंख, पैर बनकर गुरु के कार्य कर रहा हूं, सेवा कर रहा हूं तो यही सारे कार्य आपके गुरु कार्य बन जाएंगे, गुरु की सेवा बन जाएंगे ।


अगर आपका काम कंप्यूटर की कोडिंग करना है तो आप उसे भी गुरु का ही कार्य समझकर करें । अपनी निष्ठा उस कार्य के प्रति रखें, गुरु का ध्यान रखते हुये ही उस कार्य को करें तो फिर आप स्वयं ही परिवर्तन महसूस कर सकेंगे । आपका नजरिया ही बदल जाएगा और जहां नजरिया बदल जाता है वहां परिणाम भी सकारात्मक होते हैं । फिर आप काम के बोझ तले नहीं दबेंगे बल्कि वही कार्य आपको पूर्णता तक पहुंचा देगा ।


और जब भी आप सेवा भाव से कार्य करेंगे तो गुरु से प्रेम तो स्वतः ही हो जाता है और, जहां गुरु से प्रेम होता है, वहां समस्त शक्तियां आपका सहयोग करने के लिए तत्पर हो जाती है ।


फिर आप चाहे माता महाकाली के मंत्र की 1 ही माला क्यों न कर पाते हों, माता महाकाली इतने पर भी आपके कार्य स्वयं ही सिद्ध कर देंगी । अब काम चाहे नौकरी का हो, शादी का हो या फिर जीवन में सफलता पाने का, वहां तो 1 माला जप भी पर्याप्त है । अगर आप अप्सरा साधना करना चाहते हैं तो भी आपको अपने जीवन में अप्सरा का साहचर्य अवश्य मिलेगा, किस रुप में मिलेगा ये अलग बात है पर मिलता अवश्य है ।


मतलब यह कि साधना कोई भी हो, सफलता भी अवश्य मिलती है ।


यही होता है परिणाम जब हम गुरु की सेवा करते हैं, उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और उनसे प्रेम करते हैं । वहां मंत्र सिद्धि तो बहुत पीछे छूट जाती है, वो तो कुछ और ही हो जाता है । क्या होता है, उसके लिए तो आपको उस प्रेम में डूबना पड़ेगा । बिना ड़ूबे तो कुछ मिलेगा नहीं भाई जी और, बिना मूल भाव को समझे तो सच में कुछ नहीं मिलेगा ।


अगर मूल भाव समझ गये तो एक ही आसन पर बैठे - बैठे सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं और, अगर मूल भाव नहीं समझे तो 1 करोड़ मंत्र जप भी कर लेना, कुछ नहीं होगा ।


अब अगर आप कहें कि हमें तो साधना करने का भी अवसर प्राप्त नहीं हो पाता है, हम क्या करें?

रे भाई जी! मूल भाव को समझिये । गुरु को ह्रदय में विराजिए, अगर मंत्र जप नहीं कर पाते हैं तो जो नारद जी करते हैं, वही आप भी करते रहिये -


श्रीमन् नारायण नारायण नारायण, भगवती नारायण नारायण नारायण


इसी लाइन को गुनगुनाते रहिये अपने मन में, सोते, जागते, काम करते हुये, गाड़ी चलाते हुये, कंप्यूटर चलाते हुये । ये तो महामंत्र है उस परम गुरु का, जिनको हम श्रीनारायण भी कहते हैं, वही श्री नारायण हैं, वही सदगुरुदेव हैं, वही आदि हैं, वहीं अनंत हैं । अब आपकी मर्जी है, चाहे जिस नाम से पुकारो और चाहे जिस स्वरुप में उनका ध्यान करना चाहो ।


बस, कैसे भी करके गुरु को ह्रदय में विराजिए और उन्हीं से प्रेम कीजिए, उन्हीं से बातें कीजिए, अपनी समस्यायें लेकर संसार के पास न जाइये बल्कि, सीधे दौड़कर गुरु के पास आइये, जो साधना में दिक्कत आ रही है उनसे कहिये । फिर देखिये, कैसे न सफलता प्राप्त होगी । और गुरु तो आपके अपने अंदर ही विराजमान हैं, आप कहकर तो देखिये उनसे अपने मन की बात, जवाब न मिले तो कहना कि हम तो झूठे निकले ।


 

अंक और ग्रह


अंक विद्या के कई पक्षों को हमने पिछले अंकों में जाना और समझा है । कुछ गुरुभाई तो अंक विद्या - भाग १ (प्रश्न ज्योतिष) का जी - भरकर प्रयोग कर रहे हैं और अपने मन के प्रश्नों का सूझबूझ के साथ मार्गदर्शन भी प्राप्त कर रहे हैं । यही तो है वह सपना जो सदगुरुदेव देखते थे कि ज्योतिष का व्यावहारिक प्रयोग होना चाहिए । और, इस प्रकार कि एक सामान्य व्यक्ति भी बिना किसी लाग-लपेट के अपने प्रश्नों का उत्तर जान सके ।


हालांकि प्रश्न भी कई प्रकार के होते हैं और भाग-१ में दिये गये विधान के अनुसार स्पष्ट दिशानिर्देश प्राप्त हों ही, ये जरूरी नहीं है । इसलिए सदगुरुदेव ने अंक विद्या के माध्यम से कई प्रयोग स्पष्ट किये हैं जिनसे हम आने वाले समय में सामान्य परिश्रम से ही अपने प्रश्नों का समाधान स्वयं ही कर सकेंगे ।


आज हम अंक और उनका ग्रहों के साथ संबंध स्पष्ट करने जा रहे हैं । अंक अपने आप में असीम शक्ति छिपाये हुये हैं । जहां उनके प्रयोग से भविष्य की अतल गहराइयों में प्रकाश की किरणें फेंकी जा सकती हैं, वहां ये अपने आप में ग्रहों के व्यापकत्व को भी समेटे हुये हैं । अगर हम ये जानना चाहें कि किसी प्राणी पर किस अंक का सर्वाधिक प्रभाव है तो हमें अंक और ग्रहों का आपस में संबंध भी जानना ही होगा ।

निम्नलिखित अंक निम्न प्रकारेण ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं -


इसी प्रकार वारों का आधिपत्य देखें तो निम्न चित्र स्पष्ट हो जाता है -


अब प्रश्न उठता है कि क्या राशियों पर भी इन अंकों का प्रभुत्व है? भारतीय ज्योतिष में मान्य १२ राशियां हैं, उनके अधिपति ग्रह तथा उनके प्रतिनिधि अंक नीचे स्पष्ट किये जा रहे हैं -


अब, अगर किसी व्यक्ति की जन्म पत्रिका का अध्ययन करना हो तो, देखते हैं कि किस प्रकार किया जा सकता है -

यहां हम देख सकते हैं कि इस जातक के विभिन्न ग्रह निम्न प्रकार से हैं -

  1. सिंह का गुरु

  2. सिंह का मंगल

  3. कन्या का शनि

  4. तुला का बुध

  5. वृश्चिक का सूर्य

  6. धनु का शुक्र

  7. मकर का चंद्र

राहु - केतु छाया ग्रह होने के कारण इनकी गणना नहीं की जा सकती ।

अब इस जातक का संयुक्त अंक या समग्र अंक इस प्रकार बनेगा -

  1. सिंह का गुरु = 1 + 3 = 4 (यहां 1 का अंक सिंह राशि का है और और 3 का अंक गुरु का है)

  2. सिंह का मंगल = 1 + 9 = 10

  3. कन्या का शनि = 5 +8 = 13

  4. तुला का बुध = 6 + 5 = 11

  5. वृश्चिक का सूर्य = 9 + 1 = 10

  6. धनु का शुक्र =3 + 6 = 9

  7. मकर का चंद्र = 8 + 7 = 15

कुल योग = 4 + 10 + 13 + 11 + 10 + 9 + 15 = 72


72 = 7 + 2 = 9


निश्चय ही कुंडली पर 9 के अंक का सर्वाधिक प्रभाव है जिसका स्वामी मंगल है ।


आगे प्रत्येक अंक से प्रभावित रंगों का स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है । जिसकी जन्मकुंडली का जो समग्र अंक हो, उससे संबंधित रंग का रुमाल या वस्त्र पास में रखने से शुभ होता है तथा प्रत्येक कार्य में सहज ही विजय भी मिलती है ।

पिछले उदाहरण में जिस प्राणी का समग्र अंक 9 आया था, वह जेब में मिश्रित रंग का रुमाल रखे या मिश्रित रंग की टाई पहने तो निश्चय ही वह सफलता के अधिक निकट होगा ।


प्रत्येक अंक किसी न किसी भावना का प्रबल प्रतिनिधित्व करता है, वह इस प्रकार है -


स्पष्टतः जिसका समग्र अंक 9 होगा, झुकना उसके स्वभाव में न हो सकेगा । जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में ये अपने कार्यों से ही जाने जायेंगे ।

(क्रमशः)...

 

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