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प्राणप्रतिष्ठा प्रयोग के गूढ़ तथ्य

Updated: Sep 3, 2023

सदगुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी ने दशकों पहले ही प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग के गूढ़ तथ्यों को स्पष्ट कर दिया था । हम लोग सौभाग्यशाली हैं कि वह कैसेट हमें प्राप्त हो सकी और उससे भी बढ़कर, इस कैसेट के आवाज इतनी साफ है कि इसमें वर्णित तथ्यों को आसानी से समझा जा सकता है ।


यहां ध्यान देने वाली चीज ये हैं कि जिस जमाने में ये कैसेट रिकार्ड हुयीं थीं वो वीसीआर पर चलने वाली कैसेट थीं, जो 30 - 40 साल बाद खराब होने लग जाती हैं । गुरुभाइयों के अथक प्रयासों से ये कैसेटें डिजिटल रुप में हमें उपलब्ध हुयी हैं । इनकी अहमियत देखते हुये, हम इसे लिखित रुप में आप सबको उपलब्ध करवा रहे हैं ।


सबका अपना योगदान है ।


आप सब अपने जीवन में इस प्रयोग को अवश्य करके देखें और इनका लाभ उठायें । ये दुर्लभ ज्ञान तो हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक धरोहर है, इसे संभालकर रखें । सदगुरुदेव के प्रवचन का मुख्य अंश यूट्यूब पर अपलोड़ कर दिया गया है और इसी लेख के आखिर में पोस्ट कर दिया गया है ।


आगे के लेख में उस प्रवचन को शब्दशः लिख दिया गया है, ताकि किसी को प्रवचन के वीडिओ को समझने में दिक्कत न हो । प्राण प्रतिष्ठा के मूल मंत्र को भी सदगुरुदेव द्वारा बतायी विधि से लिख दिया गया है और आप प्रिंट करने के लिए पोस्ट के आखिर में दी गयी PDF file डाउनलोड़ कर लीजिए ताकि किसी भी प्रकार की असुविधा न हो ।


वैसे बेहतर तो यह रहेगा कि आप एक तरफ यूट्यूब पर पोस्ट की गयी वीडिओ का चला लें और साथ ही साथ इस लेख को पढ़ते रहें । इससे आप सदगुरुदेव के प्रवचन को बेहतर तरीके से आत्मसात कर सकेंगे ।

 

अपने प्रवचन में सदगुरुदेव ने स्पष्ट किया है कि ...


प्राणप्रतिष्ठा से तात्पर्य यह है कि कोई भी मूर्ति, चित्र या यंत्र अपने आप में विशेष प्रभाव युक्त नहीं होता । मनुष्य भी अपने आप में प्रभाव युक्त नहीं होता । यदि केवल शिष्य या केवल व्यक्ति स-शरीर, स-प्राण विद्यमान है, तब भी वह प्राण प्रतिष्ठा युक्त या दीक्षा युक्त नहीं है, उसमें विशेष शक्ति का संचार नहीं हैं, तब तक उसकी ऊर्ध्वगामी प्रक्रियायें या जीवन में ऊंचा उठने की जो प्रक्रिया होनी चाहिए, वह नहीं हो पातीं ।


जीवन में दो स्थितियां हैं - हमारे शरीर के दो भाग हैं । नाभि से नीचे का सारा भाग गृहस्थ भाग है, निम्न भाग है और, उन अंगों का उपयोग करने से मनुष्य ज्यादा से ज्यादा गृहस्थ या ज्यादा से ज्यादा सांसारिक प्रवृत्तियों में उलझता है । नाभि से ऊपर का सारा भाग ऊर्ध्व चेतना युक्त कहलाता है । और, ऊपर का भाग जाग्रत होने से व्यक्ति ऊर्ध्वमुखी बनता है, प्राणश्चेतना युक्त बनता है, ब्रह्माण्ड साधना में युक्त बनता है और ब्रह्ममय बनता है ।


व्यक्ति की दोनों प्रवृत्तियां हैं । निम्न प्रवृत्तियां, बिना प्रयास के संभव हैं और, नाभि से ऊपर की प्रवृत्तियों के लिए विशेष ज्ञान, विशेष मार्गदर्शन, विशेष अध्ययन और विशेष अध्येता की जरूरत होती है ।


आज हम जिस विषय पर बात कर रहे हैं, यह ऊर्ध्वमुखी साधना के लिए है, जीवन को अभ्युत्थान देने की साधना के लिए है, जीवन को ऊंचा उठाने की साधना के लिए है । इसलिए चाहे आपके सामने किसी भी प्रकार की साधना हो, यदि केवल मूर्ति ही कोई ताकतवान होती तो जयपुर में 300 घराने ऐसे हैं जो मूर्तियों का निर्माण करते रहते हैं । और, सैकड़ों लक्ष्मी की मूर्तियां उन्होंने बनायी होंगी और, बेची होंगी ।


यदि मूर्ति ही कोई ताकतवान हो तो, उनके अपने घर में 20 - 30 लक्ष्मी की मूर्तियां तो हर समय विद्यमान रहती हैं । हमारे घर में, पूजा स्थान में तो 1 लक्ष्मी की मूर्ति रहती है या मंदिर में 1 लक्ष्मी की मूर्ति होती है, मगर वे जीवन भर दरिद्र के दरिद्र ही बने रहते हैं । खाते हैं, कमाते हैं मगर, संपन्न नहीं हो पाते । मूर्ति अपने आप में संपन्नता नही दे सकती । मगर वही मूर्ति वहां से खरीदकर जब मंदिर में स्थापित करते हैं तो विशेष मुहुर्त में, विशेष मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठा करते हैं और विशेष प्राण प्रतिष्ठा युक्त होने पर ही उस मूर्ति में वह चमत्कार या वह विशेषता आ पाती है जिसकी वजह से उसके अध्ययन से, उसकी साधना से, उसकी सेवा से व्यक्ति संपत्तिवान बन सकता है । इसलिए विश्वामित्र संहिता में एक प्रमाण दिया है कि किस प्रकार से हम ये अनुभव करें कि इस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा हुयी है या नहीं हुयी है ।


पंडित तो मंत्र पढ़ लेंगे, जब आप अपने घर में बुलायेंगे तो पंडितजी कुछ भी मंत्र पढ़ें, आपसे तो वो ज्यादा विद्वान नहीं है। क्योंकि वो जो मंत्र पढ़ रहे हैं वो आप हिंदी में भी मंत्र पढ़ रहे हैं, आप विद्वान हैं । और वह कह देंगे कि चलो बच्चा ये मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो गयी, और ऐसा पंडित लोग करते हैं ।


जोधपुर में 5000 पंडितों के घर हैं । और अगर एक घर में 3 का औसत मानें, 1 पिता और 2 बेटे तो, 15000 पंडित हैं । और यदि बिलकुल निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो मेरी दृष्टि में उन 15000 पंडितों में केवल 22-23 पंडित हैं, बाकी सभी आजीविका वृत्ति करके कमाने - खाने वाले हैं । पंडित तो सभी हैं । सभी को मैं नमन करता हूं । पर जिनको विद्वान कहा जाना चाहिए, ऐसे केवल 22 या 23 हैं ।


बाकी ब्राह्मण तो कोई भूखे नहीं मर रहे हैं । बाकी लोगों को भी जजमान मिल रहे हैं । और जजमानों को भी पंडित मिल रहे हैं । वे पंडित विधि भी करवाते होंगे, पूजा - पाठ भी करवाते होंगे, यजमान का कल्याण भी करते होंगे और, यजमान भी उपकृत होता होगा । मगर जब तक सही ज्ञान नहीं है, जब तक सही मंत्रोच्चारण नहीं है, विधि अध्येता नहीं है तब तक किसी प्रकार का लाभ नहीं हो सकता ।


इसलिए विश्वामित्र संहिता में बताया है कि प्राण प्रतिष्ठा का एक ही कसौटी है कि मूर्ति को या चित्र को या यंत्र को रख दिया जाए और, उससे 6 फीट की दूरी पर एक बड़ा शीशा रख दिया जाए, मुंह देखने का, बीच में मलमल का पर्दा लटका दिया जाए । मलमल के परदे के उस तरफ शीशा हो, बीच में 3 फीट की दूरी पर और, इधर पंडित बैठ जाए, वह मूर्ति रख दें, यजमान भी बैठ जाए । और, फिर प्राण प्रतिष्ठा पंडित जी करें । और पूर्ण प्राण प्रतिष्ठा का प्रयोग होने के बाद ज्यों ही प्राण प्रतिष्ठा का अंतिम मंत्र उच्चारण हो, उस समय वह पर्दा हटा दिया जाए । और, पर्दा हटाते ही अगर वह शीशा टूटकर गिर जाता है, उसके तेज के प्रभाव से, तो समझना चाहिए कि प्राण प्रतिष्ठा हुयी है ।


और यदि ऐसा नहीं होता है तो केवल शब्दों की लफ्फाजी हुयी है, प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुयी है ।


यह एक कसौटी है; आज के युग में भी यह कसौटी उतनी ही मान्य है जितनी आज से 100 साल पहले थी । उस समय स्फटिक शिला रखते थे, शीशा मुंह देखने का रखते नहीं थे, जो पदार्थ संवेदनशील हो, जिससे हम तुरंत अनुभव कर सकें, यह सीधी साधी कसौटी है ।


यही कसौटी, यजमान को जब बिठाया जाता है यज्ञ में या गुरु जब शिष्य को बिठाता है साधना में तो, उसको भी प्राण प्रतिष्ठा युक्त करते हैं ।


आप इस समय जो हैं, प्राण युक्त नहीं हैं, जीव युक्त हैं । जीवन तो है आपमें, प्राणश्चेतना नहीं है । प्राणश्चेतना बिलकुल ही ऊर्ध्वगामी प्रवृत्ति है, जीवश्चेतना अधोगामी प्रवृत्ति है । जब जीव शरीर में होता है, तब उसके मन में अधोगामी प्रवृत्तियों की भावना ज्यादा रहेगी । यह मेरा पुत्र है, यह मेरी पत्नी है, यह मेरा मकान है, मुझे ऐसा करना है, मुझे ऐसा नहीं करना है, मुझे पैसा कमाना है या ऐसा करना है या वैसा करना है । 24 घंटों में केवल साढ़े 23 घंटे इसी चिंतन में आदमी लीन रहता है । ऐसे व्यक्ति जीव युक्त प्राणी कहलाते हैं ।


और जिनमें ऊर्ध्व चेतना होती है, साधनात्मक प्रवृत्ति होती है, ऐसे गृहस्थ हैं जो हरदम उनकी आंख में से आंसू टपकते रहते हैं, तिलमिलाते रहते हैं कि गुरुजी क्या करुं, मैं कैसे साधना करुं, कोई तो तरीका ऐसा बताइये मुझे, छुट्टी नहीं मिल रही है, व्यापार में से अवकाश नहीं मिल रहा है मगर मेरी इच्छा है कि मैं साधना करुं । उनकी भी पत्नी है, बच्चे हैं, सब कुछ है, मगर भावना और चिंतन ऐसा है । और जिनमें ऐसी भावना और चिंतन है, वे प्राणश्चेतना युक्त हैं ।


यदि जीवयुक्त ही व्यक्ति हो तो उसको प्राणश्चेतना युक्त बनाना जरूरी है । अगर प्राणश्चेतना युक्त नहीं होता है तो साधना में उतनी सफलता नहीं मिल पाती है जितनी सफलता मिलनी चाहिए । इसलिए प्राणश्चेतना मूर्ति में भी जरूरी है, यंत्र में भी जरूरी है, शिष्य में भी जरूरी है, आप में भी जरूरी है । और ऐसा होने पर, व्यक्ति में स्वतः अंतर महसूस होने लग जाता है । अंदर से विशेष रश्मियां, विशेष किरणें स्वतः प्रस्फुटित होने लग जाती है । स्वतः उसके मन में भावना पैदा होने लग जाती हैं कि मैं कुछ करुं । एक तड़प जो पैदा हो जाती है, वह तड़प ही व्यक्ति को पूर्ण सफलता प्रदान कर देती है ।


और प्रत्येक मूर्ति के लिए, प्रत्येक साधना के लिए, प्रत्येक यंत्र के लिए अलग - अलग प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग हैं । सैकड़ों मूर्तियां हैं, सैकड़ों देवी - देवता हैं तो, सैकड़ों प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग हैं । एक व्यक्ति केवल अपने जीवन में प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग ही सीखना चाहे तो पूरा जीवन भी कम होता है ।


मगर फिर भी, काली तंत्र में एक विशेष प्रयोग दिया है और, यह वशिष्ठ प्रणीत काली तंत्र है । वशिष्ठ ऋषि ने एक ऐसा प्राण प्रतिष्ठा मंत्र दिया है जो प्रत्येक यंत्र के लिए, प्रत्येक मूर्ति के लिए समान रुप से उपयोगी है । मैं उस गोपनीय प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग को आपके सामने स्पष्ट कर देता हूं जो कि आपके लिए उपयोगी है । वह चाहे आप भैरव साधना करें, चाहे आप यक्षिणी साधना करें, चाहे महादेव साधना करें, चाहे लक्ष्मी साधना करें । साधना से पूर्व अपने आप में भी प्राणश्चेतना की जाए, उसी मंत्र से । और उस यंत्र में भी प्राणश्चेतना की जाए । और सामने चित्र हो या मूर्ति हो तो उसमें भी प्राणश्चेतना की जाए । यह अपने आप में एक अदभुत प्राण प्रतिष्ठा मंत्र है जो कि प्रत्येक प्रकार की देवी, देवता, मूर्ति, चित्र में समान रुप से उपयोगी है । काली का प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग बिलकुल अलग है, क्लीं बीज से है । लक्ष्मी का ह्रीं बीज से है । हनुमान का हुं बीज से है । सभी के लिए अलग - अलग बीज युक्त प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग हैं ।


मगर एक विश्वामित्र वशिष्ठ ने अपने शिष्यों के अनुरोध पर एक विशेष मंत्र की रचना की । उस विशेष प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग को प्रारंभ किया और उन्होंने इसको अनुभव किया । उन्होंने देखा कि यह मंत्र लक्ष्मी साधना में भी उतना ही उपयुक्त है, जितना कि कृष्ण की साधना में, जितना कि ब्रह्म की साधना के लिए उपयुक्त है, जितना कि आत्म साधना के लिए उपयुक्त है ।


उस मंत्र को मैं आपके सामने स्पष्ट करता हूं कि किस प्रकार से उसके माध्यम से प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग किया जाना चाहिए । जब भी आप साधना में बैठें तो सबसे पहले आत्म प्राण प्रतिष्ठा करें, फिर यंत्र प्राण प्रतिष्ठा करें । हालांकि गुरुधाम से जो यंत्र आपको प्राप्त होते हैं वे प्राण प्रतिष्ठा युक्त होते हैं, फिर भी अभ्यास के लिए यंत्र की भी प्राण प्रतिष्ठा करें । और यदि आपके सामने काली की मूर्ति या चित्र है तो उसकी प्राण प्रतिष्ठा इसी मंत्र से करें जो मंत्र मैं आपको यहां दे रहा हूं ।


इस मंत्र का प्रारंभ चेतना मंत्र से होता है । आपको सर्वमान्य मंत्र बता रहा हूं । जो कि किसी काली पुस्तक में नहीं है, केवल काली तंत्र है, वशिष्ठ प्रणीत, तंत्रोक्त प्रकार है, और उसमें भी पूजा - अर्चन है, पूर्व खण्ड में, इस प्रयोग को दिया हुआ है । पूर्व में चेतना मंत्र, जब दीक्षा दी जाती है, तो शिष्य में चेतना मंत्र को प्रस्फुटित किया जाता है ।


चेतना मंत्र

।। ॐ ह्रीं मम् प्राण देह रोम प्रतिरोम चैतन्य जाग्रय ह्रीं ॐ नमः ।।

।। Om hreem mam pran deh rom pratirom chaitanya jaagray hreem om namah ।।


इस मंत्र में दिये गये मम् शब्द का प्रयोग समझना है । अगर आत्म मंत्र करना है, खुद को प्राणश्चेतना युक्त बनाना है तो मम् बोलना है । और यदि, किसी यजमान या शिष्य को बोलना है तो शिष्य का नाम उल्लेख करना पडेगा । अमुक गोत्रोत्पन्नोहं, अमुक शर्माSहं । मम् की जगह ये उपयोग करना है । यदि आप अपनी प्राणश्चेतना स्वयं करना चाहते हैं तो मम् शब्द का प्रयोग सही है । और यदि, आपकी प्राणश्चेतना मुझे करनी है तो मुझे आपके गोत्र का और आपके नाम का उच्चारण, मम् के स्थान पर करना होगा यथा, वशिष्ठ गोत्रोत्पन्नोSहं, विनय शर्माSहं । हालांकि आपको अभी गुरु बनने में देरी है, तो आप अपने स्वयं के लिए ही इसे प्रयोग करें, मम् का ही प्रयोग करें ।

इस चेतना मंत्र के बाद प्राण प्रतिष्ठा मंत्र, जो कि सर्वकालिक, सर्व मंत्रात्मक प्राणश्चेतना मंत्र कहलाता है; सर्वकालिक, सर्वप्राणश्चेतना युक्त प्राण प्रतिष्ठा मंत्र


इस मंत्र को समझने से पहले, आपको स्वर और व्यंजन, आपने सीखे होंगे बचपन में...

12 स्वर हैं -

अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः


व्यंजन हैं -

क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह


विनियोग


।। ॐ अस्य अमुक प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य वशिष्ठ ऋषि ऊर्ध्वछंद प्राण प्रतिष्ठा स्थापने विनियोगः ।।


यह विनियोग की पूरी विधि है ।


मूल रुप से 2 बीज हैं; एक बीज है 'क्रीं' और दूसरा बीज है 'हं' ।


ये दोनों ही बीज प्राण प्रतिष्ठा के मूल बीज हैं । जीवन के सर्वोच्च 2 मंत्र हैं प्राण प्रतिष्ठा के, क्रीं और हं । दोनों में 'म' की ध्वनि है ।


इन दोनों को जब सर्वकालिक प्राण प्रतिष्ठा, प्रत्येक देवता, कोई भी यंत्र हो, किसी भी प्रकार का यंत्र हो, उसमें प्राण प्रतिष्ठा के लिए या किसी भी प्रकार की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा के लिए, या स्वयं में भी प्राण प्रतिष्ठा के लिए इसी मंत्र का प्रयोग होता है । अन्यथा, प्रत्येक देवी देवता के लिए अलग - अलग प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग समझाये हुये हैं । अलग विनियोग हैं, अलग ऋषि हैं, अलग मंत्र हैं, अलग छंद है ।


यह सभी के लिए समान रुप से उपयोगी है इसलिए जब भी आप साधना करें, तब आप इस प्रयोग को करके देखें तो आपको डिफरेंस (अंतर) महसूस होगा ।


और इसमें, सारा मंत्र और सारा ब्रह्मांड केवल एक ध्वनि में समझाया हुआ है, अहम् ब्रह्मास्मि, मैं ब्रह्म हूं । और यह सारा ब्रह्मांड ब्रह्म में समाहित है । अहम् का मतलब है कि अ से लगाकर ह तक के जितने अक्षर हैं, वे अहम् के अंतर्गत आते हैं । इसलिए अहम् शब्द बना ।


अहम् शब्द बहुत सोच समझकर बनाया है कि मैं अ से लगा करके ह तक के जितने अक्षर हैं, उसके अलावा कोई शब्द बन ही नहीं सकता । जितने अक्षर हैं, संसार की सारी भाषाओं में; अंग्रेजी, फ्रेंच, मलयालम, हिंदी उन सबमें इन्हीं अक्षरों का प्रयोग होता है फिर वह चाहे । मैं चाहे पी बोलूं, चाहे ग बोलूं, अक्षर तो एक ही है । या अलिफ बोलूं या बे, पे, ते, टे, से उर्दू में बोलूं तो अक्षर तो अलिफ में अ से शुरु होगा, हिंदी में अ से शुरु होगा, अंग्रेजी में ए से शुरु होगा, वर्ण अगर अ से शुरु हैं तो अ से ही शुरु हैं ।


संसार की सारी भाषाओं के अक्षर अ से शुरु हैं । एक क्रम, अगर इसको गहराई के साथ देखेंगे, तो उर्दू में भी अगर आप देखेंगे तो कोई दूसरा अक्षर पहले नहीं है । पहले अलिफ है, फिर बे, फिर पे, ते, टे, से, जीम, चे, हे, खे । अगर हिंदी पढ़ेंगे तो अ से है । अगर संस्कृत पढ़ें तो ॐ से शुरु है । हिंदी पढ़ेंगे तो अ से शुरु है । अंग्रेजी पढ़ेंगे तो ए से शुरु है । वर्ण सारा अ से शुरु है । अ की क्या महत्ता है । मगर अ से लगाकरके अंतिम अक्षर ह है । अहम । मैं और पूरा ब्रह्मांड इस अ से ह में समाया हुआ है ।


जितने मंत्र हैं, जितनी ध्वनियां हैं, वे अ से ह में समायी हुयी हैं । क्योंकि 12 स्वर ध्वनियां हैं, अक्षर नहीं हैं । म के पास में अ लगायेंगे तो मा बन जाएगा, ई लगायेंगे तो मी बन जाएगी । संसार की जितनी भी ध्वनियां हैं वे अ से ह तक समाहित हैं ।


इसलिए बांधने की क्रिया, प्राण प्रतिष्ठा करने की जो क्रिया है, अ से ह तक की क्रियाओं को करती हैं । जब उनको पढ़ेंगे तो सारे स्वर, सारे व्यंजन, सारी ध्वनियां अपने आप समाहित हो जाएंगी ।


इसलिए क्रीं और हं, इन दोनों को मूल बीजोक्त मंत्र बताया है । इसलिए पहले अं है तो क्री अं हं


सबसे पहले क्रीं बीज लगाना है । फिर मूल अक्षर लगाना है । फिर हं बीज लगाना है ।


उसी प्रकार से पहले बोलना है

क्रीं अं हं


फिर क्रीं आं हं


क्री इं हं


दोनों बीज के साथ पहले पहला अक्षर लगायेंगे, फिर दूसरा अक्षर लगायेंगे, फिर तीसरा अक्षर लगायेंगे, इसी प्रकार से 12 स्वर लगायेंगे ।


इसी प्रकार से


क्री कं हं


फिर क्रीं खं हं


क्रीं गं हं


ठीक इसी प्रकार से अ से लगाकर ह तक के अक्षरों को बीज मंत्रों में आबद्ध कर देने की क्रिया को प्राण प्रतिष्ठा क्रिया कहते हैं । सदगुरुदेव के बताये विधान अनुसार, प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग का मूल मंत्र निम्न प्रकार है -


मूल मंत्रः


।। ॐ क्रीं अं हं क्रीं आं हं क्रीं इं हं क्रीं ईं हं क्रीं उं हं क्रीं ऊं हं क्रीं एं हं क्रीं ऐं हं क्रीं ओं हं क्रीं औं हं क्रीं अं हं क्रीं अः हं क्रीं कं हं क्रीं खं हं क्रीं गं हं क्रीं घं हं क्रीं ङं हं क्रीं चं हं क्रीं छं हं क्रीं जं हं क्रीं झं हं क्रीं ञं हं क्रीं टं हं क्रीं ठं हं क्रीं डं हं क्रीं ढं हं क्रीं णं हं क्रीं तं हं क्रीं थं हं क्रीं दं हं क्रीं धं हं क्रीं नं हं क्रीं पं हं क्रीं फं हं क्रीं बं हं क्रीं भं हं क्रीं मं हं क्रीं यं हं क्रीं रं हं क्रीं लं हं क्रीं वं हं क्रीं शं हं क्रीं षं हं क्रीं सं हं क्रीं हं हं ।।


इस मंत्र को मैंने प्रयोग करके लिखा है । यह मंत्र वास्तव में ही बिना प्राण प्रतिष्ठा के, इस मंत्र के माध्यम से स्वयं की प्राण प्रतिष्ठा करें । स्वयं प्राण प्रतिष्ठा का मतलब है कि आप विनियोग करके, चेतना मंत्र करके, उसके बाद अपने ह्रदय पर हाथ रखकर या अपनी शिखा पर हाथ रखकर इस पूरे मंत्र को 3 बार उच्चरित करें ।


विशेष - जिस अक्षर के उच्चारण में अपने भाई - बहन परेशान हो जाते हैं वह अक्षर है ङं, इसका साधारण उच्चारण है अंग् । जब प्राण प्रतिष्ठा की जाती है तो इस पर ऊपर एक बिंदी लगे होने से इसका उच्चारण हो जाएगा अंगम् । आशा है बाकी के अक्षरों का उच्चारण आप भली भांति कर सकेंगे ।


इसको कागज पर लिख लें या प्रिंट कर लें तो फिर याद करने की जरूरत नहीं रहेगी ।


इन पूरे वर्णों को बांधना है इन क्रीं और हं बीज में ।


यह प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग मंत्र है । विनियोग पहले ही ऊपर लिखा जा चुका है । और संसार में आप किसी भी विद्वान के सामने खड़े हो सकते हैं, किसी भी प्रकार की आप प्राण प्रतिष्ठा करवाते हैं तो अपने आप में एक नवीन प्रयोग होगा ।


प्राण प्रतिष्ठा मंत्र को स्वयं पर, आपके सामने चित्र है तो उस पर, यंत्र है तो उस पर, तीनों पर प्रयोग किया जा सकता है । इसको नित्य प्रयोग करने की जरूरत नहीं है । यदि व्यक्ति नवरात्रि में पहले दिन प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग कर लेता है तो उसे बार - बार प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं है ।


स्वयं को शिखा पर हाथ रख करके, या वक्ष स्थल पर दाहिने हाथ की उंगलियों का स्पर्श करते हुये, यंत्र के मध्य भाग में इसका उच्चारण करना है । और चित्र के भी मध्य भाग में स्पर्श करना है । आपके शरीर का स्पर्श हो और फिर मंत्र प्रयोग हो ।


दूसरी बात है कि दीपक प्रज्वलित रहे । आपके दाहिनी तरफ घी का दीपक जलता रहे ।


तीसरा, प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग के 2 प्रकार हैं -


सामान्य, विशेष और अति विशेष


सामान्य में केवल 1 बार प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग करना है । विशेष में 3 बार प्रयोग करना है । अति विशिष्ट में 101 बार प्रयोग करना है ।


सामान्य में 1 बार प्रयोग करने से काम चल जाता है । विशिष्ट में, जब कोई बड़ी साधना करनी हो तो 101 बार प्रयोग करना चाहिए ।


चौथा, प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग में उत्तराभिमुख होकर बैठना चाहिए । हमारा मुख उत्तर की तरफ हो ।


और पाँचवाँ, प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग से पूर्व गुरु की अनुमति, गुरु पूजन या जो भी आपके इष्ट हों, यदि गणपति आपके इष्ट हों तो गणपति इष्ट का पूजन करने, यदि गुरु हों तो गुरु पूजन करके उसके बाद में प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग करना चाहिए ।

 

(प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग)

 

प्रिंट करने के उद्देश्य से, इस प्रयोग को संक्षिप्त रुप में PDF file में आप यहां से डाउनलोड़ कर सकते हैं ।


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