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सूक्ष्म शरीरः गुप्त मठ और सिद्ध क्षेत्र-7

Updated: Sep 3

आवाहन भाग-35

गतांक से आगे...


अघोर मंत्र


।। ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः घोर घोर तरेभ्यः सर्वतः सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रुपेभ्यः ।।


इस प्रकार एक अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रक्रिया का सहज ही ज्ञान सदगुरुदेव के आशीर्वचन से प्राप्त हुआ।


सदगुरुदेव ने बात को आगे बढाते हुए कहा कि यह बात हुई सिद्ध क्षेत्रो की। निश्चय ही किसी भी सिद्ध क्षेत्र में प्रवेश करना दुर्लभ तथा कठिन क्रिया है लेकिन असंभव नहीं है, साधक अगर परिश्रम करे तो वह ऐसे सिद्ध स्थानों में प्रवेश कर सकता है।


सिद्ध स्थान या क्षेत्र के ऊपर भी ऐसे कई स्थान है जिसे दिव्य स्थान कहा जाता है। यहां पर चेतना, मात्र चेतना न होकर दिव्यता में परावर्तित हो जाती है। चेतना मनुष्य को आतंरिक तथा बाद में बाह्य विकास की ओर ले जाती है, जबकि दिव्यता व्यक्ति को ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार कर देती है। वस्तुतः यह अध्यात्म की एक अत्यधिक उत्कृष्ट भावभूमि है जिसकी प्राप्ति निश्चित रूप से किसी के भी परिश्रम की कसौटी सी है।


साधक की सत्ता जब प्रकृति के कण कण में व्याप्त हो जाती है तो साधक की सत्ता एक निश्चित प्रक्रिया या क्षेत्र या कार्य से सबंधित न होकर प्रकृति के हर एक अणु में व्याप्त हो जाती है, इसके बाद साधक कभी भी कोई भी घटना किसी भी क्षेत्र में घटित हो रही हो, उसमे हस्तक्षेप करने की सामर्थ्य रखता है। ऐसे उच्चकोटि के आध्यात्म तरंगों से निर्मित जो स्थान हैं वह, दिव्य स्थान कहलाते है। ऐसे स्थान चतुर्थ आयाम में होते है तथा इसमें प्रवेश के लिए साधक को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे स्थान में साधक सतत दिव्यता से संस्पर्षित रहता है तथा प्रकृति उसकी सहचारिणी होती है। ऐसे स्थानों में जो भी देवी देवता का आवाहन किया जाए वह निश्चय ही उसी क्षण प्रकट होते है, साधक जो भी कामना या इच्छा को अपने मानस में लाता है वह पूर्ण होती ही है


मेरे मुंह से निकल गया, सिद्धाश्रम? क्योंकि सिद्धाश्रम के बारे में भी मैंने ऐसा ही सुन रखा था।

उन्होंने कहा, "सिद्धाश्रम दिव्य स्थान न हो कर उससे भी ऊपर है। सिद्धाश्रम के बारे में जनमानस ने जितना सुना या पढ़ा है वह उसका कोटि कण भी नहीं है, सिद्धाश्रम की महत्ता को शब्दों में बांधना संभव नहीं है। लेकिन ऐसे दिव्य स्थान सिद्धाश्रम के आसपास ज़रूर हैं, मानसरोवर तथा राक्षसताल के निकट ऐसे ८ स्थान है, इसके अलावा दिव्यगंज, राजेश्वरीमठ, सिद्धमठ, संभमठ, गुप्तमठ जैसे कई दिव्य स्थान है जो कि भारत तथा नेपाल में स्थित हैं, इन मठों में कई सिद्ध निवास करते हैं तथा आध्यात्म क्षेत्र में साधकों को कल्याण प्रदान करने के लिए हमेशा कार्यरत रहते है"। 

मैंने पूछा इनमें प्रवेश के लिए साधक को क्या करना चाहिए? सदगुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा कि यह गुरुमार्ग है, यह साधक के गुरु के ऊपर निर्भर करता है कि वह उसे कब और कैसे ऐसे दिव्य स्थान में ले जाए तथा कौन सी प्रक्रिया को संपन्न करा कर ले जाए।


मैंने पूछा कि जैसा आपने कहा कि सिद्धाश्रम दिव्य स्थान से भी ऊपर है। क्या ऐसे कोई और भी स्थान हैं? मेरे प्रश्न को सदगुरुदेव ने हंस कर टाल दिया। अब तक मैं समझ गया था कि बस, इसके आगे अब उत्तर मिलना संभव नहीं है। उनकी एक मुस्कान में ब्रह्माण्ड के करोडोंं रहस्य समाये हुए हैं, जब भी मैं कुछ पूछने जाता था तो ऐसा एहसास मुझे हर बार होता था।


अल्प समय में ही सदगुरुदेव से सिद्ध स्थान तथा सिद्ध क्षेत्रो के बारे में जितना भी जाना और समझा था उसका एक लाखवां हिस्सा भी मैं अपने जीवन भर में प्रयत्न कर के भी नहीं जान सकता था, उनकी कृपा दृष्टि सच में किसी के भी अज्ञान को दूर कर ज्ञानवान बनाने के लिए पर्याप्त है। लेकिन फिर भी, हर बार की तरह सैकडों सवाल के जवाबों ने नए हज़ारों सवालों को मानस में जन्म दे दिया।


गिर सिद्ध क्षेत्र में मानस में एक चलचित्र की भांती ये सारी घटनाये कुछ ही क्षणों में गुजर गई। हां, मेरे सामने ये वही सिद्ध हैं जिन्होंने मुझे कहा था कि जिज्ञासा भाव काफी नहीं है, अगर ज्ञान प्राप्ति के लिए साधक प्रयत्नशील होता है तो, निश्चय ही उन्हें सिद्धों का साहचर्य प्राप्त होता है। कई साल हो गए थे लेकिन पहचानाने में बिलकुल भी गलती नहीं हुई थी मुझसे, उस खंडहरनुमा मकान में वो दो सिद्ध अभी भी वहीं खड़े थे, मेरी उपस्थिति का कोई विशेष असर नहीं था उन पर। सिद्ध अभी भी मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रहे थे। मैंने उनको श्रद्धा सहित प्रणाम किया। वे अभी भी उसी सफ़ेद चोगे में थे, बिना किसी भी भाव के उनका चेहरा जैसे प्राकृतिक प्रसन्नता और आत्मसंतुष्टि से ओत प्रोत था।


यही थे वह गिर सिद्ध क्षेत्र के संरक्षक जो कि न जाने कितने ही मेरे जैसे अबोध और अज्ञानी बालकों का कल्याण निश्चल भाव से कर रहे हैं और न जाने कब से। मैं तो इनका नाम तक नहीं जानता फिर भी आंखें थोड़ी नम सी हो गईं, पता नहीं क्यों। सिद्धों के संसार में जो निश्चल प्रेम और स्नेह प्राप्त होता है वह इस स्थूल जगत में कहां।

मैंने श्रद्धा से उन्हें वंदन किया उन्होंने मुझे आशीर्वचन देते हुए कहा, "बेटा, तुम्हारे मानस में जो भाव उभर रहे हैं उन्हें मैं समझ रहा हूं लेकिन यह तो मेरा कार्य है। मेरी कृतज्ञता है सिद्धों से, कई सालो पहले भी और उसके बाद भी तुम्हारे पास मैं जब-जब भी आया था, तब मुझे आपके श्री सदगुरुवर से आज्ञा प्राप्त हुई थी। यह मेरे लिए उनकी सेवा का एक बहुत बड़ा अवसर था।"


मैं क्या कहता, मेरे पास अब कुछ जानने के लिए या पूछने के लिए बचा ही नहीं था। शायद थोड़ी देर और खड़ा रहता तो मेरी आंखों में रोके हुए आंसू बाहर आ ही जाते, मैंने उनसे प्रणाम किया जो कि जाने का संकेत था। उनके मुख से आशीर्वचन निकला, "मां शक्ति तुम्हारा कल्याण करे" तथा वे जो दो सिद्ध वहां पर आये थे उनके अभिवादन तथा वार्तालाप में संलग्न हो गए।


शाम घिर आई थी, दूर कहीं जय गिरनारी के नाद के साथ झालर बजता हुआ सुनाई दे रहा था। सदगुरुदेव को मन ही मन याद किया, एक-एक क्षण अपने शिष्यों का किस प्रकार वे ध्यान रखते हैं, उनके स्नेह और प्रेम के सामने और क्या कर सकता था, बस मन में ही उनको प्रणाम किया और अपने गंतव्य की और चल पड़ा...

 
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