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शक्ति प्रवाह, साधना और सिद्धि - १

Updated: Aug 29, 2023

प्रारब्ध और संचित कर्म


एक बार किसी गांव में एक सज्जन महाजन रहा करता था । महाजन और वो भी सज्जन...! पर सच्चाई भी यही थी । और उसकी सज्जनता का कारण भी बड़ा स्पष्ट था । जब भी उससे कोई व्यक्ति पैसा उधार लेने आता तो वह केवल एक ही चीज पूछता -


"पैसे इसी जन्म में वापस करोगे या अगले जन्म में"?


अब जो जैसे कह देता, वह अपने बही - खाते में वैसे ही लिख लेता और पैसे आगंतुक को दे देता ।


गांव वालों को नियम पता थे ही तो वहां सबका काम आराम से चल ही जाता था ।


किसी समय एक चोर को भी यही बात पता चली तो उसने सोचा कि ये तो बड़ा अच्छा मौका है । अगले जन्म की कहकर, चाहे जितने पैसे ले लो और कभी वापस भी न आओ । यही विचार करके वह चोर उसी महाजन के यहां पहुंच गया । अपनी क्षमता से उसने पैसे उधार मांगे तो महाजन ने उससे भी वही पूछा -

"पैसे इसी जन्म में वापस करोगे या अगले जन्म में"?


चोर तो इसी फिराक में था । तपाक से कहा - अगले जन्म में...!


महाजन ने मुस्कराकर कहा - जैसी तुम्हारी मर्जी और, पैसे दे दिये ।


अब तो चोर मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ कि यहां तो चोरी भी नहीं करनी पड़ी और मुंह मांगा धन भी मिल गया ।

चोर वापस चल दिया ।


दरअसल महाजन के बैठने का रास्ता उसकी गौशाला से होकर जाता था । चोर गौशाला से ही होकर आया था और गौशाला से ही होकर वापस जा रहा था । उस गौशाला में सैकड़ों गायें थीं । सब एक से बढ़कर एक ।

जब चोर महाजन से मिलने आया था, तब तो उसने कुछ खास महसूस नहीं किया था लेकिन वापसी के समय उसे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ । दरअसल, वापसी के समय अब वह गायों की भाषा समझ सकता था । चोर हैरान था लेकिन गौशाला से होकर चलता रहा । तभी उसने दो गायों को आपस में बात करते सुना -


पहली गायः तुम यहां कब आयीं बहन?

दूसरी गायः मुझे तो यहां 3 साल हो गये बहन

पहली गायः मैं तो अभी एक हफ्ते पहले ही आयी हूं

दूसरी गायः तुमने कितना धन उधार लिया था?

पहली गायः मैंने तो कुल 2000 रुपये लिये थे । तुमने कितने लिये थे?

दूसरी गायः मैंने तो अगले जन्म की कहकर 5000 रुपये लिये थे । 3 साल हो गये दूध देते - देते । अभी तक तो उधार पूरा नहीं चुका पायी हूं ।

पहली गायः मैंने भी अगले जन्म की कहकर धन उधार लिया था । तुमसे तो कम ही थे । क्या पता जल्दी चुका दूं ....


चोर हैरान होकर उन दोनों की बातें सुन रहा था । हैरान भी था और परेशान भी । जो अपनी आंखों से देख रहा था और कानों से सुन रहा था, उस पर उसे सहज ही विश्वास नहीं हो पा रहा था । अब उसने सिर उठाकर देखा तो चारों तरफ गायें ही गायें रंभा रही थीं ।


उसने एक पल को सोचा - और चुपचाप महाजन के पास पहुंच गया ।


महाजन ने मुस्कुराते हुये पूछा, "क्या हुआ"? आप तो अगले जन्म में आने वाले थे ।


चोर की आंखों में आंसू आ गये और कहा, "मैं गाय नहीं बनना चाहता" ।


हाथ जोड़े, महाजन को प्रणाम किया और वापस लौट गया ।

 

कहानी सच्ची है या झूठी, ये तो ईश्वर ही जाने लेकिन, इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है ।


कुछ याद आया?


हम भी तो अपने जीवन में न जाने किस - किस से कुछ न कुछ लेते रहते हैं और वापस कभी नहीं चुकाते । सोचते हैं कि फिर कभी चुका देंगे । और, चुकाने का मौका किसी - किसी को ही मिल पाता है । कुछ चुकाते रहते हैं, कुछ नहीं, सब तरह के लोगों से ये दुनिया भरी पड़ी है ।


वैसे कुछ लोग तो जबरदस्ती ही ले लेते हैं और वापसी की कहने पर भी वापस नहीं करते ।


मैं किसी और की क्या कहूं, लोग तो गुरुजी को भी नहीं बख्शते ।


खैर, सब अपना - अपना कर्जा ही चुकाते हैं । सब लिया - दिया ही है जो चुकाने या भोगने के लिए वापस जन्म लेना ही पड़ता है । अगर कर्म अच्छे रहते हैं तो व्यक्ति राजा का सुख भोगता है । अगर कर्म ठीक से नहीं किये या गलत कर्म किये हैं तो जब भी गणित फलित होगा, व्यक्ति को कष्ट भोगना ही पड़ेगा ।


हम लोग अष्टक वर्ग के माध्यम से यह पहले ही देख चुके हैं कि किसी ग्रह को अपने अष्टक वर्ग में मिली शुभ रेखाओं का क्या फल होता है । साधारण तौर पर अगर किसी ग्रह को अष्टक वर्ग में 3 या उससे कम शुभ रेखायें मिलती हैं तो जातक को उस ग्रह से संबंधित फल में न्यूनता प्राप्त होती है । और, 5 या उससे अधिक शुभ रेखायें मिलती हैं तो संबंधित ग्रह का उच्च प्रभाव जातक को प्राप्त होता ही है ।


तो यह तो रही गणित फलित होने की बात । पर बात यह भी है कि यह परिस्थिति आखिर आती ही क्यूं है?


आखिर हम कर्ज के जाल में फंस कैसे जाते हैं?


आखिर हमें बार - बार कर्ज चुकाने के लिये वापस क्यूं आना पड़ता है?

 

किसी भी कार्य की पूर्णता में शक्ति लगती ही है । कार्य चाहे किसी भी प्रकार का हो, बिना शक्ति के प्रयोग के पूर्णता संभव नहीं है । अब चाहे यह शक्ति धन की हो, शरीर से हो, मानसिक ऊर्जा हो या फिर आध्यात्मिक ऊर्जा ही क्यों न हो, पर बिना शक्ति के संधान हुये संभव नहीं है ।


संधान वैसे तो तीर को धनुष पर चढ़ाने को कहा जाता है । लेकिन जब तीर का संधान किया जाता है तब धनुष की प्रत्यंचा के माध्यम से वह ऊर्जा उसमें समा जाती है । और यही ऊर्जा तीर को अपने लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करती है ।


यह सिद्धांत जीवन के प्रत्येक पक्ष में उतना ही प्रभावी है जितना कि तीर - धनुष - लक्ष्य के संदर्भ में है ।


कई साधक सवाल करते हैं कि उनका कोई कार्य सिद्ध नहीं हो पा रहा है, किसी को नौकरी नहीं मिल रही है, किसी की शादी नहीं हो पा रही है, किसी को व्यापार में सफलता नहीं मिल रही है । अगर आध्यात्मिक प्रश्नों की दृष्टि से देखें तो कई साधक शिकायत करते हैं कि उनको साधना में सफलता नहीं मिल पा रही है ।


इन सबका उत्तर देना जटिल नहीं हैं लेकिन इसको समझने के लिए कुछ चीजें समझना जरूरी है । पिछली पोस्ट में हमने ऊर्जा के रुप को लेकर बात की थी । ऊर्जा को न तो आप उत्पन्न कर सकते हैं और न ही नष्ट कर सकते हैं, साथ ही किसी भी सिस्टम में मौजूद ऊर्जा उतनी ही रहती है जितनी पहले थे, बशर्ते बाहर से कुछ ऊर्जा न दे दी जाए ।


यह ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धांत है ।


साधना में जो सिद्धि मिलती है, वह भी एक ऊर्जा ही है ।


इसकी तुलना कीजिए किसी वाहन से जो किसी रास्ते से गुजरना चाहता है । अब अगर रास्ता साफ होगा, चौड़ा होगा, ट्रैफिक नहीं होगा तो वाहन को तेज गति से उस रास्ते से गुजारा जा सकता है ।


अगर रास्ते में बहुत गंदगी है, या रास्ते में बहुत भीड़ है या रास्ता ही स्वयं में बहुत संकरा है तो फिर उस रास्ते पर वाहन चलाना भी आसान न होगा । एक्सीडेंट की संभावना अलग से रहती है ।


ठीक वैसा ही कुछ आपकी कार्य - सिद्धि में भी होता है । अब इसको समझने का प्रयास करते हैं ।


प्रत्येक मंत्र की शक्ति अपार होती है । लेकिन वह शक्ति गुजरेगी तो आपके शरीर से ही । शरीर की नाड़ियां ही वह माध्यम होती हैं जिनसे होकर ब्रह्माण्ड की अपार ऊर्जा आपसे होकर बह सकती है और आपका कार्य सिद्ध कर सकती है । अब अगर आपका शरीर सक्षम नहीं हुआ तो उस ऊर्जा के प्रवाह को ही झेल नहीं सकेगा । फलस्वरुप सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकेगी । ये तुलना आप संकरे रास्ते से कर सकते हैं ।


अगर पूर्व जन्म के संस्कार ऐसे थे जो इस जन्म में भी सामने आकर खड़े हो गये हैं तो भी आपका शरीर सिद्धि - प्राप्ति में सहयोग नहीं कर सकता । ये तुलना आप रास्ते में खड़ी भीड़ या ट्रैफिक से कर सकते हैं । अष्टक वर्ग से यही पता किया जाता है । प्रत्येक ग्रह की शुभ रेखा उस ग्रह से संबंधित उच्च या निम्न प्रभाव को दर्शाती है, जो आपको आपके प्रारब्ध के रुप में मिला है ।


अगर इस जन्म के कर्म, कामनायें या विचार ऐसे हैं जो सिद्धि प्राप्ति में बाधक हैं तब भी आपको सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती है । इसकी तुलना आप सड़क पर पड़ी हुयी गंदगी या कूड़े के ढे़र से कर सकते हैं ।


वजह जो भी हो, जब तक इन सब तत्वों को हटाया नहीं जाएगा, तब तक साधना में सिद्धि तो दूर की बात है, मामूली सफलता प्राप्त करना भी बहुत मुश्किल है ।


पूर्व जन्म के संस्कारों को तो जान पाना या देख पाना बहुत मुश्किल होता है पर फिर भी उनका निवारण गुरु कृपा से संभव है । साथ ही इस जन्म के कर्म, विचार, कामनायें भी ऐसा विषय हैं जिन पर न सिर्फ चर्चा संभव है, बल्कि आप इसका निवारण स्वयं भी कर सकते हैं ।


अगर आपको लगता है कि यह सब करना तो बहुत ज्यादा है ... तो फिर यह रास्ता आपके लिए नहीं है ।

साधना का तात्पर्य सिर्फ अपने शरीर को तपाना नहीं हैं, बल्कि अपने तप के माध्यम से ऊपर वर्णित इन सभी अवरोधों को भस्म कर देना है और यह कोई बच्चों का खेल नहीं है ।

 

मैं जब साधना के क्षेत्र में आया था तो आप सबकी भांति ही मेरे मन में सैकड़ों सवाल रहा करते थे । सोचा करता था कि ये सब मंत्र काम करते भी हैं या सब फिजूल है । जीवन में बहुत संघर्ष भी करना पड़ा ।


लेकिन इन सबके बीच एक चीज कॉमन थी - मैंने साधना करना कभी बंद नहीं किया ।


और एक समय ऐसा भी आया जब शरीर में शक्ति का प्रवाह स्वतः ही शुरु हो गया । सदगुरुदेव से सीधे ही बहुत सारी विद्यायें प्राप्त हुयी हैं जिनमें सूर्य विद्या, श्मशान सिद्धि, लक्ष्मी सिद्धि इत्यादि । दरअसल अब तो मैं ज्यादा चीजें याद भी नहीं रखता, क्योंकि शक्ति का यह प्रवाह तो अब चलता ही रहता है । कुछ लोग ऐसा कह सकते हैं कि ऐसा कैसे संभव है; अभी तो केवल गुरु त्रिमूर्ति ही विद्यमान हैं, सदगुरुदेव से सीधे ही इन विद्याओं को प्राप्त करना किस प्रकार से संभव है?


उन लोगों को सिर्फ यही कह सकता हूं कि अभी भी लोग सदगुरुदेव को समझ नहीं सके हैं । जो शाश्वत हैं, उनको सिर्फ एक ही कालखण्ड से जोड़कर देखना उचित नहीं है । हालांकि सदगुरुदेव आपके सामने किस स्वरुप में आयेंगे, ये तो वही जानें लेकिन दृष्टि आपके भी पास होनी चाहिए कि आप उनको पहिचान सकें । इस पर चर्चा फिर कभी और लेकिन आपको अभी एक महीने पहले की घटना बताता हूं -


रात में करीब २ः30 बजे का समय रहा होगा, नींद कुछ उचट सी गयी थी । सोने के कोशिश की लेकिन नींद आ ही नहीं रही थी । कुछ देर बाद मैं किसी अशरीरी आत्मा की उपस्थित महसूस कर पा रहा था । पर चूंकि सदगुरुदेव ने श्मशान सिद्धि दी हुयी है तो मुझे इन अशरीरी योनियों से कोई भय व्याप्त नहीं होता है । मूल बात ये हैं कि ज्यादातर समय नकारात्मक शक्तियां मुझसे दूर ही रहती हैं । कभी अगर कोई मेरे आसपास होता भी है तो माता महाकाली की शक्तियां उनको वहां से ले ही जाती हैं ।


इतना सब होने पर भी मन में एक क्षण के लिए भय व्याप्त हुआ था । भय महसूस होना भी मेरे लिए बड़ा अजीब था कि कमाल है, आज मन में डर लग रहा है । खैर, मैं लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा ।


कुछ पल बाद ही मैंने उसे अशरीरी योनि को अपने कमरे में प्रवेश करते देखा । आंखें हालांकि बंद थी लेकिन मैं फिर भी सब देख सकता था । फिर मैंने उसे अपने सिरहाने की तरफ बढ़ते हुए देखा, चूंकि मैं करवट से लेता था तो एक हाथ कमर के ऊपर ही रखकर सो रहा था । उसने मेरे हाथ को स्पर्श किया, उस क्षण ऐसा लगा जैसे कि किसी ने जलते हुये अंगारे समान हाथ से मेरे हाथ को स्पर्श किया है । मन में गुस्सा तो बहुत आया कि इसकी इतनी हिम्मत । उठकर उसका गला पकड़ने की कोशिश की थी मैंने । लेकिन ऐसा लगा कि शरीर तो हिल ही नहीं पा रहा है । मैंने तुरंत गुरु मंत्र का जप किया । आप सोच नहीं सकते कि मात्र 1 बार के (मानसिक) उच्चारण से ही उसने मेरे हाथ से अपना हाथ हटा लिया । दूसरी बार उच्चारण मात्र से वह पीछे हटकर गायब हो गया । तीसरी बार उच्चारण के समय ही मेरा शरीर खुल चुका था और मैंने जब उसका गला पकड़ने के लिए हाथ उठाया तब वहां कोई मौजूद नहीं था ।


ये तो रही गुरु मंत्र की महिमा । जो लोग ये सोचते हैं कि सिर्फ गुरु मंत्र से क्या हो सकता है तो उपर्युक्त उदाहरण पर्याप्त होगा ।


लेकिन सोचने वाली बात ये भी है कि हमारे सुरक्षा कवच को भेदकर, मेरे हाथ को स्पर्श मात्र से जला देने की क्षमता वाली शक्ति कोई छोटी - मोटी तो रही नहीं होगी । ये जलन इतनी थी कि मैंने उसका प्रभाव कई दिन तक महसूस किया था । वैसे, मैं भी मन ही मन सोचता रहा कि उसने मुझे अपनी शक्ति का अहसास तो करा ही दिया था लेकिन उसने भी गुरु मंत्र की शक्ति का स्वाद अच्छे से चख लिया होगा ।


बाद में सदगुरुदेव ने बताया कि कुछ शक्तियां तो इतनी पावरफुल होती हैं कि उनकी शक्ति हनुमान जी के बराबर होती है । लेकिन उनकी शक्तियां घटती - बढ़ती रहती हैं । खैर, ज्यादा तो कुछ नहीं बताया पर कहा कि कभी - कभी गलतफहमी के कारण ऐसा हो जाता है । उन शक्तियों को जब ये पता चलता है कि फलां व्यक्ति तो परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी का शिष्य है तो वो लोग फिर दुबारा ऐसा नहीं करते हैं ।


क्रमशः...

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