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सदगुरु कृपा विशेषांकः मुझे मृत्यु चाहिए

Updated: Aug 29, 2023

मणिपुर भेदन स्तोत्र


मेरे अपने जीवन का अनुभव और सार है कि सदगुरुदेव न जाने किस - किस प्रकार से, कैसे - कैसे टेढ़े - मेढ़े रास्तों से निकालकर शिष्य को बाहर लाते हैं कि बस...इस बात को या तो गुरु ही जानते हैं या शिष्य । और, यहीं से गुरु और शिष्य के बीच का जो संबंध है, वह माता और शिशु के समान हो जाता है । ऐसा शिष्य परम ज्ञानी होते हुए भी गुरु के समान शिशुवत ही हो जाता है और जैसे 2 साल का बच्चा माता को पाने के लिए आंखों में आंसू लिए तब तक रोता रहता है जब तक उसकी मां उसे गोद में न उठा ले, उसी प्रकार से शिष्य भी तब तक स्वयं को संभाल ही नहीं सकता जब तक गुरु उसके सिर पर प्रेम से हाथ न फेर दें ।


पर ऐसे शिष्य का स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं होता है । सही अर्थों में देखा जाए तो उसने इसी जीवन में ही उस मृत्यु को प्राप्त कर लिया होता है जहां पर परम शांति होती है और जहां पहुंचकर ही गुरु कृपा और गुरु सत्ता का सही अर्थों में अनुभव किया जा सकता है ।


वैसे, मृत्यु एक ऐसा शब्द है जिसे सुनकर ज्यादातर लोग भयभीत ही हो जाते हैं पर मेरी राय में इससे खूबसूरत शब्द हो ही नहीं सकता । हालांकि, मृत्यु शब्द स्वयं में ही एक जटिल शब्द है इसलिए प्रत्येक साधक या शिष्य को मृत्यु विषय पर चिंतन अवश्य करना चाहिए, इससे आध्यात्मिक उन्नति का भी रास्ता प्रशस्त होता है ।

मेरी राय में मृत्यु 3 प्रकार की होती है -

  1. पहली प्रकार की मृत्यु वह है जब हम सांसारिक बाधाओं से घिरे रहते हैं, अत्यंत परेशान और दुःखी रहते हैं, पग - पग पर अपमान झेलना पड़ता है या फिर जब हमारे जीवन का अधिकतर समय केवल चिंताओं के चिंतन में गुजरता रहता है । इस प्रकार का जीवन एक प्रकार से अभिशप्त जीवन ही कहलाता है और, ये इस प्रकार का जीवन है जब व्यक्ति रोज मरता है ।

  2. दूसरी प्रकार की मृत्यु वह है जब हम अपनी देह का त्याग कर देते हैं । तब इस संसार के बंधनों से पीछा तो छूट जाता है लेकिन कर्म - फल की श्रृंखला से पीछा फिर भी नहीं छूट पाता । वह तो जन्म-जन्मांतरों तक हमारे साथ ही चलता रहता है । इस प्रकार की मृत्यु दरअसल पहले प्रकार की मृत्यु से कुछ खास अलग नहीं होती है । कई मायनों में वह पहले प्रकार की मृत्यु से भी बदतर होती है । उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति ने अगर अपने जीवन की परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली तो वह देह तो छोड़ देगा लेकिन बहुत संभव है कि उसे अगला जन्म लेने में और भी बहुत वर्षों का इंतजार करना पड़े । ये भी हो सकता है कि उसे किसी और योनि में धकेल दिया जाए; प्रेत योनि, ब्रह्म राक्षस, भूत इत्यादि सब इसी के उदाहरण हैं ।

  3. तीसरी प्रकार की मृत्यु वह है जो हमें जीते-जी सभी बंधनों से मुक्त कर देती है । सीधे शब्दों में कहें तो यह मृत्यु से अमरता की ओर हमें अग्रसर कर देती है । शास्त्रों में इसी को आवागमन से मुक्ति प्राप्त करना भी कहते हैं ।

एक बार सदगुरुदेव से मैंने जिज्ञासा वश पूछा कि सभी साधकों को सिद्धियां क्यों नहीं प्राप्त होती हैं ।


इसके जवाब में उन्होंने एक दूसरा ही प्रश्न पूछा ।

कभी मुर्दे को देखा है?

मैंने कहा - हां ।

अगर उसके मुंह पर गोबर लीप दो तो उस पर कोई फर्क पड़ेगा?

मैंने कहा - नहीं ।

अगर उसको हलुआ खिला दो या इत्र महकाने के लिए दे दो, तब?

मैंने कहा - उसको इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा ।

तब सदगुरुदेव बोले कि सिद्धियां प्राप्त करने के लिए पहले मरना ही पड़ता है । जिंदा आदमी तो उनको संभाल पाने से रहा ।


मैंने पूछा कि ये कैसे संभव है?


सदगुरुदेव ने बताया कि हमारे अंदर कितना कुछ भरा पड़ा है - हमारा आत्म सम्मान, अहंकार, चिंतायें, लोभ, वासनायें, इच्छायें, अनिच्छायें, क्रोध, अक्रोध, गुण, अवगुण... कितना कुछ है न हमारे पास? जब व्यक्ति का शरीर इतने तत्वों से भरपूर हो, तब दिव्यता के लिए स्थान ही कहां बचता है भला?


थोड़ा विचार करके देखिए तो सही कि हमारे अंदर क्या - क्या भरा पड़ा है?


दरअसल, हमसे बेहतर तो इसे कोई दूसरा बता भी नहीं सकता । विचार तो कीजिए कि हमारा जीवन किन चीजों पर टिका हुआ है, ऐसा क्या है जो हम हमेशा सोचते रहते हैं, ऐसा क्या है जो हमारे लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है और ऐसा क्या है जिसके न होने से आप और आपका जीवन दोनों ही धराशायी हो जाएंगे ।


मेरी राय और अनुभव कहते हैं कि अगर गुरु तत्व के अलावा कुछ भी ऐसा है जिसके न होने से आप धराशायी हो जाएं, आपका जीवन तबाह हो जाए तब आपको सच में विचार करने की आवश्यकता है कि क्या आप आध्यात्मिक धरातल पर कुछ कदम चल भी पाए हैं?


क्या सच में हम गुरु के प्रति समर्पित हो भी पाये हैं?


क्या हम गुरु तत्व को उसके वास्तविक रुप में धारण कर भी पाये हैं?


अगर ऐसा नहीं है तो फिर से विचार करिए, चिंतन करिये और मंथन करिये कि कहां गड़बड़ हो गयी इस रास्ते पर चलते - चलते?


और, सबसे बड़ी बात तो यही है कि किस प्रकार की मृत्यु आप चाहते हैं?


 

जीवन में कई चीजें ऐसी होती हैं जिनसे साधक वर्ग को 2 - 4 होना ही पड़ता है । बिना इससे गुजरे आगे का रास्ता खुलता ही नहीं है । आज जिस विषय पर चर्चा हो रही है, वह जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है - कामदेव । सदगुरुदेव ने मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान के वर्ष 1986 के प्रथम अंक में इस बात का उल्लेख किया है कि कामदेव के आठ प्रमुख अंग हैं -


स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् । संकल्पोSध्यवसायश्च क्रिया निर्वतिरेव च ।।

एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्तिः विचक्षणाः । विपरीत ब्रह्मचर्यदेमेतदेवाष्ट लक्षणम् ।।


1 - अर्थात् पूर्व काल में किये गये संभोग या जिसके साथ संभोग किया हो उसे याद करना

2 - अश्लील बातें करना या काम क्रीड़ा संबंधी साहित्य पढ़ना

3 - छेड़छाड़ या हंसी मजाक करना

4 - छिपकर ऐसे व्यक्ति, घटना या दृश्य को देखना जिससे भोग की इच्छा प्रबल होती हो

5 - स्त्री और पुरुष द्वारा एकांत में छिपकर बातें करना

6 - काम क्रीडा करने का विचार

7 - संभोग से संबंधित प्रयत्न करना

8 - ऐसे कार्य या प्रयत्न करना जिससे कामोत्तेजना हो


ये आठों ही कामदेव के अंग हैं और संयमित जीवन को बरबाद करने वाले शत्रु हैं । इनसे बचे रहना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है ।


अब बात करते हैं एक साधक और उसके जीवन में उन तत्वों की जो उसको जीवित बनाए रखते हैं । वैसे, अब तक आप समझ ही गये होंगे कि एक साधक उस श्रेष्ठ मृत्यु को प्राप्त क्यों नहीं कर पाता है । ऊपर लिखे कामदेव के इन आठ अंगों में से कोई भी एक या एक से अधिक अंग ऐसे हो सकते हैं जो साधक को उलझाकर रख सकते हैं ।


इसमें उस साधक की गलती नहीं है । कामदेव तत्व रुप में प्रकृति में विद्यमान हैं और वह सिर्फ अपना काम कर रहे हैं । साधक संयमित अवश्य रह सकता है लेकिन इस संयम के चक्कर में कितनी आद्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है, वह केवल एक साधक ही समझ सकता है ।


अगर कोई सुंदर स्त्री सामने आयेगी तो मन में तो विचार आयेगा ही । अगर, उस स्त्री में सम्मोहन तत्व की प्रबलता होगी तो आप उसकी तरफ खिंचेंगे ही । ये एक ऐसी चीज है जिसमें आप कुछ कर ही नहीं सकते । ये काम कामदेव का है और वो इस काम को बखूबी करते हैं । अब अगर आप एक साधारण इंसान हैं तो आप ऊपर बताये आठ स्वरूपों से बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं और, अगर आप साधक हैं तो आपकी बेशकीमती साधनात्मक ऊर्जा इससे संयम करने में खर्च हो जाएगी ।


हो कुछ भी, नुकसान आप ही का है ।


और, ये बात स्त्रियों के लिए भी उतनी ही सटीक है जितनी पुरुषों के लिए । इसलिए इस फेर में न रहिए कि केवल पुरुष ही कामदेव का शिकार बनते हैं ।


किसी भी साधक या साधिका के लिए श्रेष्ठ स्थिति तब बनती है जब उसको किसी की भी उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता । अगर स्वयं अप्सरा या यक्षिणी भी उसके समक्ष आ जाए तब भी वह उतना ही सहज और सरल रहे जितना कि एकांत में, तब समझिये कि उसने उस तत्व पर मृत्यु प्राप्त कर ली है ।


 

मणिपुर भेदन स्तोत्र


सदगुरुदेव ने हजारों हीरक खण्ड दशकों पहले ही बिखेर दिये थे । पर काल क्रम में साधक वर्ग उन साधनाओं की तरफ ज्यादा आकर्षित हो गया है जो अद्वितीय सिद्धि प्राप्त करने का मौका देती हैं । हालांकि सिद्धि कितने लोगों को प्राप्त हो पाती है, ये एक अलग ही चिंतन का विषय है ।


सदगुरुदेव ने अपनी पुस्तक हिमालय के योगियों की गुप्त सिद्धि में इस बात का उल्लेख किया है कि मणिपुर भेदने से व्यक्ति को अमृत तत्व की प्राप्ति होती है और शरीर पूर्णतः निरोग एवं स्वस्थ बना रहता है । हालांकि सदगुरुदेव ने एक अन्य जगह पर इस बात का भी उल्लेख किया है कि मणिपुर चक्र के जागरण से व्यक्ति भोग और विषय वासनाओं से भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है, किसी स्त्री को देखने के बाद उसकी आंखों में कामुकता नहीं आती, किसी स्त्री को अर्ध नग्न देखने के बाद भी उसका शरीर उत्तेजित नहीं होता क्योंकि मणिपुर चक्र के जागरण से आनंद का द्वार खुल जाता है, आनंद की अनुभूति होने लगता है, उसका जीवन ही परिवर्तित हो जाता है और देखने की दृष्टि ही बदल जाती है, विचार शक्ति बदल जाती है ।

(मणिपुर चक्र जागरण के लाभ)


इस महत्वपूर्ण प्रवचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन में मणिपुर चक्र जागरण का एक साधक को विशेष प्रयास करना चाहिए ।


हिमालय के योगियों की गुप्त सिद्धि पुस्तक में सदगुरुदेव ने मणिपुर चक्र भेदन का एक आसान तरीका बताया है कि एक विशेष स्तोत्र के माध्यम से, जिसका यदि प्रतिदिन 108 बार पाठ किया जाए और ऐसा 21 दिन तक किया जाए तो सीधे ही मणिपुर चक्र में साधक की स्थिति बन जाती है । यह सब ध्वनि का महत्व है और इस स्तोत्र में शब्दों का संगुंफन कुछ इस प्रकार से है कि उससे शरीर में एक विशिष्ट आवर्तन होता है और उसके माध्यम से मणिपुर चक्र भेदन हो जाता है । यह अमृत तत्व कहलाता है और ऐसी स्थिति में पूरे शरीर में स्वतः अमृत निर्माण होता रहता है फलस्वरुप योगी पर रोग एवं वृद्धावस्था का कोई प्रभाव नहीं होता ।


पुस्तक में हालांकि यह स्तोत्र उपलब्ध है, फिर भी इस स्तोत्र को यहां पर दिया जा रहा है ताकि जिन साधकों के पास वह पुस्तक न हो, वह भी इस स्तोत्र के माध्यम से मणिपुर चक्र जागरण का प्रयास कर सकें -


ॐ नमः परमकल्याण नमस्ते विश्वभावन । नमस्ते पार्वतीनाथ उमाकान्त नमोस्तुते ।।


विश्वात्मने विचिन्त्याय गुणाय निर्गुणाय च । धर्माय ज्ञानमक्षाय नमस्ते सर्वयोगिने ।


नमस्ते कालरुपाय त्रैलोक्यरक्षणाय च । गोलोक्यातकायैव चण्डेशाय नमोस्तुते ।।


सद्योजाताय देवाय नमस्ते शूलधारिणे । कालान्ताय च कान्ताय चैतन्याय नमोनमः ।


कुलात्मकाय कौलाय चन्द्रशेखर ते नमः । उमानाथ नमस्तुभ्यं योगीन्द्राय नमो नमः ।।


सर्वाय सर्वपूज्याय ध्यानस्थाय गुणात्मने । पार्वती-प्राणनाथाय नमस्ते परमात्मने ।।


 

जब मैंने इस स्तोत्र का अभ्यास किया था तब मात्र 21 दिन नहीं किया था बल्कि उससे कुछ दिन पहले से ही अभ्यास शुरु कर दिया था और अनुष्ठान पूरा होने के बाद भी कुछ समय तक करता रहा था । इससे मुझे 21 दिन के अनुष्ठान के समय बहुत मदद मिली । हालांकि मेरा मकसद मणिपुर चक्र जागरण नहीं था, मुझे केवल विषय - वासनाओं से मुक्ति चाहिए थी और इसी के हेतु मैंने सदगुरुदेव से प्रार्थना की थी और मुझे मेरा मनोवांछित वरदान मिला भी ।


साधकों को एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि चक्र जागरण एक बहुत ही विशेष परिस्थिति है और सीधे ही उसमें नहीं कूद जाना चाहिए । पहले - पहल उससे संबंधित लाभों के लिए ही साधना करनी चाहिए ताकि शरीर उस चक्र की ऊर्जा को आत्मसात कर सके । बाकी, इसी स्तोत्र का अभ्यास आप करते रहिये, कौन जाने किस क्षण में सदगुरुदेव आपको वह वरदान प्रदान कर दें जिसके लिए आप इसका अभ्यास कर रहे हैं ।


सदगुरुदेव तो कृपालु हैं, अपने प्रत्येक शिष्य का हित ही उनका एकमात्र अभीष्ट है । उन पर पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास बनाए रखें ।


आप सबको भी अपने जीवन में मणिपुर चक्र जागरण के लाभ प्राप्त हो सकें और अंततोगत्वा मणिपुर चक्र में आपकी स्थिति बन सके, ऐसी ही शुभेच्छा है ।


अस्तु ।

 

इस स्तोत्र की PDF फाइल आप यहां से डाउनलोड़ कर सकते हैं ।

मणिपुर भेदन स्तोत्र
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इस स्तोत्र की ऑडिओ फाइल आप यहां से और YouTube से भी डाउनलोड़ कर सकते हैं





साधकों को चाहिए कि हिमालय के योगियों की गुप्त सिद्धि पुस्तक उनके पास अवश्य उपलब्ध हो; गुरुधाम से यह आसानी से मंगवायी जा सकती है । हालांकि इंटरनेट पर इसकी प्रति उपलब्ध है लेकिन मूल प्रति को पढ़ने का आनंद ही अलग है । बाकी जैसी रही भावना जिसकी ।


 

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