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काल ज्ञानः अष्टक वर्ग-3

Updated: Sep 3, 2023

भाव और ग्रह


अब तक हमने सियाराम कुमार की जन्म कुंडली के माध्यम से सर्वाष्टक वर्ग बनाया है । हालांकि इस पोस्ट में हम इसको बनाना नहीं सीख रहे हैं बल्कि ये देख रहे हैं कि आखिर गणना के बाद जो सर्वाष्टक वर्ग बनता है, वह किस प्रकार दिखता है । इसके साथ ही हमें ये भी समझना होगा कि इसमें जो 96 वर्ग बनते हैं, उनमें आये हुये इन 96 अंकों (शुभ रेखाओं) को किस प्रकार से समझा जाता है ।


पिछली पोस्ट में हमने इन 96 अंकों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था -

  1. पहली श्रेणी - जिसमें अंकों का मान 0 से 3 के बीच में होता है ।

  2. दूसरी श्रेणी - जिसमें अंकों का मान 4 होता है ।

  3. तीसरी श्रेणी - जिसमें अंकों का मान 5 से 8 के बीच में आता है ।

शुभ रेखाओं का संबंध एक तरफ तो ग्रहों (सूर्य, चंद्र... इत्यादि) से होता है और दूसरी तरफ राशियों से होता है । अगर इस संबंध को समझना है तो पहले हमको कुंडली के भावों और ग्रहों की प्रकृति को भी समझना होगा । अगर हम यही नहीं समझते हैं कि कौन सा भाव किस चीज को दर्शाता है अथवा कौन से ग्रह का कार्य क्या होता है तो हम सर्वाष्टक वर्ग के इन 96 अंकों को कभी भी सही से समझ नहीं सकते । इसलिए आज की पोस्ट केवल भाव और ग्रह पर विवेचन के लिए हैं ।


भाव

प्रत्येक कुंडली में 12 स्थान, घर या भाव होते हैं । सबसे ऊपर के भाव को लग्न भाव या प्रथम भाव कहते हैं । सदगुरुदेव ने इन भावों के नाम और किस भाव से किस - किस बात का ज्ञान मिलता है, बताया है जो निम्नलिखित हैं -


प्रथम भाव - लग्न, लग्न भाव, उदय, आद्य


इस भाव से शरीर, शारीरिक स्वास्थ्य, बचपन, आचरण, दुर्बलता, पुष्टता, रंग, गुण, स्वभाव, आत्मबल, रुप, आकृति तथा व्यक्तित्व का ज्ञान किया जाता है ।


दूसरा भाव - धन भाव, कुटुंब, वाणी


धन, कोष, पैतृक संपत्ति, कुटुंब, मित्र, जेल, गायन, वाणी आदि का ज्ञान किया जाता है ।


तृतीय भाव - पराक्रम, सहोदर, भाव, वीर्य, धैर्य


छोटा भाई या छोटी बहन, पराक्रम, साहस, हिम्मत, वीरता, योग, प्रभुत्व, ख्याति, विशेषता आदि का ज्ञान होता है ।


चौथा भाव - सुखभाव, मातृ भाव


घरेलू जीवन, सुख, मानसिक शांति, वाहन, चौपाये पशु, मनोरंजन, माता आदि का ज्ञान होता है ।


पांचवां भाव - बुद्धि, पितृ, नंदन, पुत्रभाव


संतान, संतान सुख, विद्या, भावना, ख्याति, प्रबंध, दक्षता, अनायास धन प्राप्ति, जुआ, नम्रता आदि का ज्ञान होता है ।


छठा भाव - रोग, अंग, शत्रु, रिपु, कष्ट, भय


शत्रु, रोग, भय, मुकदमा, झगड़ा, परतंत्रता इत्यादि का ज्ञान होता है ।


सातवां भाव - कलत्रभाव, गृहस्थ, काम, गमन


स्त्री, स्त्री का स्वास्थ्य, मदन पीड़ा, प्रेमी-प्रेमिका, भोग-विलास, विवाह, स्त्री का रंग-रुप, आकृति, स्वभाव आदि का अध्ययन ।


आठवां भाव - आयु, रंध्र, मृत्यु


आयु, मानसिक व्यथा, विदेश, ऋण, संग्राम इत्यादि का ज्ञान होता है ।


नवम भाव - धर्म, भाग्य, शुभ


भाग्य, भाग्योन्नति, भाग्य पतन, धर्म, शुभ-कार्य, प्रसिद्धि, नेतृत्व इत्यादि का ज्ञान होता है ।


दशम भाव - राज्य, कर्म


राज्य, मान, नौकरी, प्रतिष्ठा, सेवावृत्ति, पितृ सुख, व्यापार, ऐश्वर्य, भोग, कीर्ति, आत्मविश्वास, प्रमोशन, स्थान, परिवर्तन इत्यादि का ज्ञान होता है ।


ग्यारहवां भाव - आय, लाभ


लाभ, आमदनी, आमदनी के स्रोत, गुप्तधन, वाहन सुख, बड़े भाई का सुख, स्वतंत्र चिंतन आदि का ज्ञान होता है ।


बारहवां भाव - व्यय, अन्त्यम


व्यय, हानि, ऋण, व्यसन, शत्रु, विरोध, फिजूलखर्ची इत्यादि का ज्ञान होता है ।

भाव और उनका जन्मांग चक्र में स्थान

ग्रह

सदगुरुदेव के बताए अनुसार, अब आगे प्रत्येक ग्रह किस - किस का कारण है, इसको स्पष्ट किया जा रहा है -


सूर्य

आध्यात्मिक भावना, पराक्रम, तेजस्विता, हिंसक कार्य एवं हिम्मत का कारक ग्रह है ।


चंद्रमा

सज्जनता, शीलता, नम्रता, भावुकता, सुंदरता, यात्रा आदि । मस्तिष्क संबंधी विचारों एवं कार्यों का विशेष प्रतिनिधि है ।


मंगल

युद्ध, नेतृत्व, सेनापतित्व, पुलिस, अस्त्र-शस्त्र, कृषि भूमि संबंधी कार्य । डाक्टरी परीक्षा, मकान, सुख इत्यादि का कारक ग्रह है ।


बुध

व्यापार, लेन - देन, खरीद - बिक्री, वणिक वृत्ति, ऐश्वर्य, भोग, बैंकिंग, स्टेनो, टाइपिस्ट इत्यादि का कारक ग्रह है ।


गुरु

शिक्षा, पांडित्य, वाद-विवाद, शास्त्रार्थ, धार्मिक कार्य, प्रोफेसर, गजेटेड़ अधिकारी, नेतृत्व, प्रसिद्धि इत्यादि का कारक ग्रह है ।


शुक्र

सुंदरता, सौम्यता, संगीत, कला, सिनेमा, विदेश यात्रा, हड्डी विशेषज्ञ, वेश्या, मौज, प्रेम, प्रेमी-प्रेमिका इत्यादि का कारक ग्रह है ।


शनि

छल - कपट, धोखा, व्यभिचार, रोग, ऋण, कूटनीतिज्ञता, नेता, राजदूत इत्यादि का कारक ग्रह है ।

 

विशेष


अष्टक वर्ग का अध्ययन जितना सरल है, उतना ही रोचक और प्रामाणिक भी । अष्टक वर्ग से प्रत्येक ग्रह की शक्ति का अनुमान हो जाता है और, साथ ही यह भी पता चल जाता है कि वह किसका कारक है ।


कोई भी ग्रह जब अपने ही अष्टक वर्ग में 5 शुभ रेखाओं को लेकर बैठता है, तो प्रबल माना जाता है । और, प्रबल ग्रह अपने कारकत्व को बढ़ायेगा ही ।


रेखाओं के संबंध में निम्न जानकारी उपयोगी रहती है -


एक शुभ रेखा - अत्यंत कमजोर निर्बल


दो शुभ रेखा - सामान्य


तीन शुभ रेखायें - दोष युक्त लेकिन शुभता की ओर अग्रसर होने वाला


चार शुभ रेखायें - सम (न शुभ, न अशुभ)


पांच शुभ रेखायें - अनुकूल


छह शुभ रेखायें - श्रेष्ठ


सात शुभ रेखायें - विशिष्ट, प्रबल


आठ शुभ रेखायें - पूर्णतः अनुकूल

 

उदाहरणार्थ, सियाराम कुमार की जन्मकुंडली में सूर्य पंचम भाव का स्वामी है तथा, सूर्याष्टक वर्ग में 6 शुभ रेखाओं को लिये हुये है । ये 6 शुभ रेखायें वृष और कुंभ राशि में स्थित हैं । अतः जब भी सूर्य, वृष या कुंभ राशि में आया होगा, सियाराम कुमार को संतान का सुख अवश्य प्राप्त हुआ होगा ।


पर यदि यही सूर्य दशम भाव में होता तो इनको निश्चय ही राज्य पक्ष में श्रेष्ठ पद की प्राप्ति होती और वो उन्नति करते । परंतु भाग्यवश, सूर्य की स्थिति दशम भाव में नहीं है । इसलिए इनका सरकारी नौकरी का योग नहीं बन सकता है ।


सियाराम कुमार की जन्म कुंडली में सूर्य और बुध दोनों ही पंचम भाव के स्वामी हैं और चूंकि ये मेष राशि में हैं जिसका स्वामी मंगल है । मंगल की मित्रता सूर्य के साथ तो है, लेकिन बुध के साथ शत्रुता है । इस वजह से सियाराम कुमार को संतान सुख में तो कोई बाधा नहीं आयेगी लेकिन अपने व्यापार अथवा आमदनी के स्रोतों के साथ संघर्ष करते रहना पड़ेगा ।


अभी आपने देखा कि अष्टक वर्ग को समझना तो आसान है लेकिन उसकी व्याख्या करने के लिए आपको कुछ बुनियादी जानकारी अवश्य होनी चाहिए । अगली पोस्ट में हम जानेंगे कि प्रत्येक अष्टक वर्ग में शुभ रेखाओं की संख्या का क्या महत्व है, कौन सा ग्रह किस राशि का स्वामी होता है और किस ग्रह की किस ग्रह के साथ मित्रता या शत्रुता है ।


क्रमशः...


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