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सद्गुरु कृपा विशेषांक - मन की शक्ति से कार्य सिद्धि


सहारनपुर यज्ञ महोत्सव संपन्न हो चुका है । दिव्यता क्या होती है ये तो हमने अलीगढ़ महोत्सव में ही देख लिया था लेकिन दिव्यता के साथ परम आनंद क्या होता है, ये तो सहारनपुर यज्ञ महोत्सव में ही देख सके ।


जीवन में कई महान यज्ञों में भाग लेने का सौभाग्य मिला है लेकिन यह यज्ञ अपने आप में बहुत सी दुर्लभतम घटनाओं को भी अपने आप में समेटे हुये था, गुरु आज्ञा मिली तो कभी उस पर भी चर्चा अवश्य करुंगा लेकिन आज तो केवल इतना ही बता सकता हूं कि जो भी भाई- बहन इस यज्ञ में किसी भी प्रकार से शामिल रहे हैं, उनके सौभाग्य की तुलना किसी भी भौतिक वस्तु से नहीं की जा सकती है ।


मैं स्वयं भी अपने आपको इस लायक नहीं पा रहा हूं जो शब्दों के माध्यम से उस दिव्य आनंद की अनुभूति को आपके समक्ष रख सके । लगभग ऐसी ही हालत उन सबकी भी है जो उस यज्ञ में भाग लिये हैं ।


इसलिए अगर जीवन में इस दिव्य आनंद की अनुभूति करना चाहते हैं तो मेरी राय में केवल एक ही तरीका है - सदगुरुदेव महाराज से प्रार्थना कीजिए कि आपको भी जीवन में इस प्रकार के यज्ञ में भाग लेने का सौभाग्य मिल सके ।


मैं यज्ञ से चुनिंदा कुछ तस्वीरें यहां शेयर कर रहा हूं, आप सब भी आनंद लीजिए -


सहारनपुर यज्ञ महोत्सव

(जनवरी 24 - 25, 2024)


 

परिवर्तन का जीवन में महत्व

जब हम परिवर्तन को पकड़ लेने की क्रिया सीख जाएंगे तो यह क्रिया साधना ही कहलाती है । साधना केवल ईश्वर प्राप्ति और भक्ति का मार्ग नहीं है । साधना तो स्वयं की देह में स्वच्छता लाने, मन में शुद्धता लाने, घर में आनंद और संतोष लाने, परिवार में सद्भावना लाने, समाज में यश और कीर्ति लाने, भौतिक जीवन में लक्ष्मी लाने तथा उसे अपने घर में स्थाई रूप से निवास कराने तथा आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता प्राप्त करने की प्रक्रिया है । यही साधना का एक क्रम है, जिसे निभाना है ।
- परम पूज्य सद्गुरुदेव महाराज श्री नन्दकिशोर श्रीमाली जी

परिवर्तन के अलावा एक शब्द और है - "बोध" । परिवर्तन और बोध, ये दोनों ही ईश्वर की कृपा हैं ।


देखा जाए तो परिवर्तन ही प्रत्येक चीज का मूल है और अगर परिवर्तन न हो तो जीवन जीना भी असंभव है ।


कल्पना कीजिए कि अगर दिन के बाद रात न हो, या रात के बाद दिन ही न हो तो कैसे लगेगा? समय का बोध ही दिन या रात से होता है और, इसी से समय के महत्व का भी पता चलता है । ऋतुयें भी बदलती हैं तो मौसम का भी महत्व पता चलता है ।


ठीक इसी प्रकार जीवन में भी परिवर्तन आते ही हैं ।


कभी ये परिवर्तन भीषड़ ठंड या गर्मी की तरह कष्टकारी होते हैं और कभी बसंत ऋतु की तरह सुखकारी भी होते ही हैं । दोनों ही स्थितियां है जीवन की । सदगुरुदेव महाराज ने परिवर्तन की क्रिया को पकड़ने के लिए अपने शब्दों में जो क्रम रखा है वह भी यूं ही नहीं है लेकिन बिना बोध हुये उसको समझ पाना कठिन है । आप क्रम पर जरा गौर करें -


  1. पहला है, देह की स्वच्छताः हम नहाकर, धोकर, अच्छे कपड़े पहनकर, बन संवर कर देह की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं ।

  2. मन में शुद्धता लानाः मन में अच्छे विचारों का आना, सबके लिए अच्छा चिंतन करना, क्रोध न करना, वासनात्मक विचारों से दूरी बनाना इत्यादि सब इसी में आते हैं ।

  3. घर में आनंद और संतोष लानाः घर में आपकी उपस्थिति मात्र से सबका मन प्रसन्न रहे और जो भी कार्य आप करें, उससे घर में प्रत्येक प्राणी संतोष अनुभव करे ।

  4. परिवार में सद्भाव लानाः आपका प्रत्येक भाव ईश्वर की तरफ उन्मुख हो ताकि परिवार के बाकी लोग भी ईश्वर की भक्ति की तरफ अग्रसर हों ।

  5. समाज में यश और कीर्तिः आपके कार्य ही समाज में आपको यश और कीर्ति प्रदान करेंगे ।

  6. भौतिक जीवन में लक्ष्मी लानाः कर्म करेंगे तो लक्ष्मी जी का आगमन होगा ही । फिर चाहें, आप नौकरी करें या व्यवसाय करें, आपके लिए लक्ष्मी का ही आधार है । और इस प्रकार कर्म करें कि जीवन में लक्ष्मी जी स्थायी रूप में विराजमान हो सकें ।

  7. आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता की प्राप्तिः साधना करते हुये, तप करते हुये, चिंतन और मनन के माध्यम से अपने आध्यात्मिक जीवन को भी पूर्णता प्रदान करना ।


इन सात बिंदुओं में सदगुरुदेव महाराज ने जीवन का समस्त सार निचोड़कर रख दिया है । लेकिन आप गौर करें कि शुरुआत के छह बिंदुओं में केवल भौतिक जीवन को ही संवारने का संदेश दिया है और यह संकेत दिया है कि अगर आप आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता प्राप्ति तक पहुंचना चाहते हैं तो इन छह बिंदुओं से होकर ही गुजरना होगा । उसके बाद ही संभव है कि आप अपने जीवन में आध्यात्मिक रुप से पूर्णता प्राप्त कर सकें ।


मन के हारे हार है, मन के जीते जीत


सदगुरुदेव महाराज ने अपने दूसरे बिंदु में मन की शुद्धता के महत्व को रेखांकित किया है । आज के लेख में इसी विषय पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे ।


वैसे तो प्रत्येक मनुष्य हमेशा प्रयास करता है कि उसका मन बेकार की चीजों से बचा रहें पर जरा सोचिये कि इस संसार में रहते हुये क्या यह सच में संभव है? सच्चाई तो यह है कि हम अपने वातावरण से, अपने आसपास के समाज, लोगों के विचारों से, उनकी राय, आलोचना, तारीफ, देश-समाज और अंतर्राष्ट्रीय जगत में घटित हो रही घटनाओं से बहुत ज्यादा प्रभावित होते रहते हैं और, हमारे अपने विचारों को सही मायनों में हमारे अपने ही मन में जगह बनाने में भी बहुत दिक्कत होती है ।


वातावरण में हर समय इतनी तरंगें व्याप्त रहती हैं कि हमारा मन उनसे अछूता नहीं रह पाता है ।


हालांकि, जब जीवन में प्रसन्नता का समय रहता है, सफलताएं मिलती जाती हैं तो मनुष्य शिकायत करने की स्थिति में नहीं रहता है । अब भला, खुशी में कौन शिकायत करने जाएगा, भले ही मन शुद्ध रहे या न रहे, क्या फर्क पड़ता है 😁


लेकिन जब हमारे अपने जीवन में परेशानी आती है तब तो यह सब सोचना पड़ता है । ऐसे समय में न जाने कैसे - कैसे विचार आते रहते हैं, न जाने कैसी - कैसी आशंकायें मन को घेरे रखती हैं । कभी दुख होता है, कभी मन गुस्से से भर जाता है । और भी न जाे क्या - क्या ...


अब भला मन को शुद्ध रखे कौन?


आपको तो लग रहा होगा कि राजीव भईया को तो जब देखो तब प्रवचन देते रहते हैं । उनको तो शायद पता ही नहीं है कि जब समस्या आती है तो प्रवचन काम नहीं आता हैं, समस्या आयेगी तो समस्या ही निपटायी जाएगी न, इसका मन को शुद्ध रखने से क्या संबंध हो सकता है?


संबंध है मेरे भाई... इसीलिए आज इस विषय पर चर्चा छेड़ी है ।


जब तक हमारा मन ही शुद्ध नहीं होगा, निर्मल नहीं होगा तब तक हम भी सहज नहीं हो सकेंगे, सरल नहीं हो सकेंगे । मन शुद्ध हो जाए तो उसके बाद ही आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके घर में आनंद आये, संतोष आये और समाज में यश एवं कीर्ति भी प्राप्त हो सके । मन के शुद्ध होने के बाद ही साधनाओं के माध्यम से लक्ष्मी प्राप्त हो सकेगी अन्यथा लाखों मंत्र जप कर भी आप अपने जीवन में लक्ष्मी का आगमन संभव नहीं कर सकते, आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता प्राप्ति तो बहुत दूर की बात है ।

मन को शुद्ध कैसे करें?


मन को शुद्ध करना तो बहुत आसान है । कठिन तो केवल मन को शुद्ध करने की तरफ अपनी दिशा करना है । हम सारा समय अपना ध्यान संसार की तरफ लगाये रखते हैं लेकिन कभी ये नहीं सोचते कि संसार की तरफ मुंह करके खड़ा होना तो सूर्य की तरफ पीठ करके खड़े होने जैसा है ।


जब सदगुरुदेव महाराज तो हमारे अपने अंतर में ही विराजमान हैं तो फिर संसार की तरफ मुख करने से क्या मिल जाएगा? संसार की तरफ मुख करने से तो केवल तनाव मिल सकता है, परेशानियां मिल सकती हैं, जीवन के अभाव मिल सकते हैं और कभी न पूरी हो सकने वाली इच्छाओं का एक रचा - बुना मकड़ी जैसा जाल मिल सकता है । जिसके संपर्क में आने के बाद बाहर आ पाना तो संभव ही नहीं हो पाता ।


तो फिर क्या करें?


करना क्या है, अपनी दिशा और दशा अपने अंतर में विराजमान गुरु की तरफ मोड़ दीजिए ।


प्रश्नः जब परेशानियां सिर पर खड़ी होंगी और जीवन में तनाव होगा, आलोचनायें होंगी, दुख होगा तो भी क्या अपनी दिशा संसार से मोड़ी जा सकती है?


दिशा तो अवश्य ही मोड़ी जा सकती है, बस तरीका पता होना चाहिए । और, तरीका भी बहुत आसान है -


"कुछ मत करिये"


अगर आप कुछ भी नहीं करेंगे तो मानकर चलिये, आपने आधा मोर्चा तो फतह कर ही लिया ।


प्रश्नः आपने तो कह दिया कि कुछ मत करिये, तो क्या नौकरी छोड़ दें, व्यवसाय छोड़ दें, घर की जिम्मेदारियां छोड़ दें, जिनसे कर्ज लिया है, उनसे बात करना छोड़ दें?


किसने कहा है कि नौकरी छोड़ दीजिए या किसी जिम्मेदारी से भाग जाना है । ये सब संसार के कार्य हैं, ये तो करने ही होंगे । आपको तो केवल एक ही चीज छोड़नी है - फल की प्राप्ति की इच्छा ।


अगर आपने फल की प्राप्ति की इच्छा छोड़ दी तो आप इस बात की मुझसे गारंटी ले सकते हैं कि आपका जीवन उसी क्षण से तनाव मुक्त हो जाएगा और विश्वास मानिये, एक तनाव मुक्त मस्तिष्क बहुत अधिक ऊर्जा के साथ कार्य कर सकता है ।


प्रश्नः हमारी इच्छाओं का क्या होगा? उन समस्याओं का क्या होगा जो जीवन में चली आ रही हैं? हम कर्ज कैसे चुकायेंगे?


एक बात जान लीजिए कि जीवन में सब कुछ पहले से ही निर्धारित है कि कब कौन सा सुख प्राप्त होगा और कब कौन सा दुख आयेगा । हम लोग जब अष्टक वर्ग ज्योतिष के सेशन लेते हैं तो इस बात पर चर्चा करते हैं कि आपका जीवन वैसे नहीं है जैसे आप सोचते हैं । ये तो पहले से ही निर्धारित था लेकिन जब सुख आता है तो हम खुश हो जाते हैं और जब दुख आता है तो दुखी हो जाते हैं । हम कभी इससे परे हटकर ये देख ही नहीं पाते कि क्या इससे अलग भी कुछ हो सकता है ।


जीवन में बदलाव संभव है लेकिन ये तभी हो सकता है जब हमारी चेतना का स्तर ऊपर की ओर उठना प्रारंभ कर दे । और, चेतना के स्तर में बदलाव तब तक संभव नही होता है जब तक हम अपने जीवन को उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार नहीं कर लेते । ज्योतिष इस वास्तविकता को स्वीकार करने में बहुत मदद करता है । अगर आपने भी आज तक ज्योतिष की मदद नहीं ली है तो समय पड़ने पर मदद अवश्य लें । एक अच्छा ज्योतिषी आपकी कुंडली का विश्लेषण करके आपको वास्तविकता को स्वीकार करने में मदद कर सकता है । हम लोग टेलीग्राम पर सेशन लेते रहते हैं, समय मिले तो वहां अवश्य ज्वॉइन करें । व्यक्तिगत सेशन के लिए आप वेबसाइट पर बुक कर सकते हैं, मैं यहां लिंक शेयर कर रहा हूं -



मदद किसी से भी लें लेकिन वास्तविकता को स्वीकार करें, बिना उसके समर्पण भी संभव नहीं है ।


प्रश्नः अगर वास्तविकता को स्वीकार कर लेंगे तो, क्या हमारी समस्या का समाधान हो जाएगा?


सबसे पहली बात यह है कि वास्तविकता को स्वीकार करना सीढ़ी पर पहला कदम रखने जैसा है । अगर आपने पहला कदम उठा लिया तो फिर रास्ता तो ऊपर की तरफ ही जाएगा, फिर समय चाहे जितना लग जाए, समाधान प्राप्त होना तय हो जाता है ।


समस्या तो तभी तक है जब तक हम अपने वास्तविक रास्ते पर चलने के लिए कदम नहीं उठाते हैं । एक बार सही दिशा में पहला कदम भी उठा लिया जाए तो भी हम अपनी मंजिल की तरफ एक कदम नजदीक हो जाते हैं ।


उसके बाद तो फिर चलते जाना है जब तक समस्या का समाधान पूरी तरह न मिल जाए । यही जीवन को व्यावहारिक तरीके से जीना कहलाता है ।


प्रश्नः आपका ये कथन तो मनोवैज्ञानिक उपचार जैसा लगता है जिसमें मन तो शांत हो जाएगा लेकिन इससे हम जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना कैसे कर सकते हैं? हमारी इच्छाओं का क्या होगा और उन समस्याओं का क्या होगा जो बंदूक की तरह हमारे सामने खड़ी हुयी हैं?


अरे भाई! पहले एक कदम तो उठाइये । अगर मन ही शांत नहीं होगा तो फिर समाधान की बात भी कैसे समझ आ सकती है । अगर आप आध्यात्मिक मार्ग पर चलकर अपने भौतिक जीवन की समस्याओं को सुलझाना चाहते हैं तो सदगुरुदेव प्रदत्त साधनाओं के माध्यम से ऐसा करना बिलकुल संभव है । मैंने भी अपने जीवन की समस्याओं को साधनाओं के माध्यम से ही सुलझाया है ।


हालांकि, अगर मैं ऐसा कर पाने में समर्थ हो सका हूं तो उसके पीछे सदगुरुदेव महाराज की करुणा, प्रेम और उनका आशीर्वाद ही मुख्य रहा है । मेरा अनुभव कहता है कि साधनायें हमको शांत रहने में और "कुछ न करने" की सामर्थ्य प्रदान करती हैं ।


किसी परिस्थिति विशेष में "कुछ न करना" कितना महत्वपूर्ण है ये इस बात से समझ सकते हैं कि अगर परिस्थिति विशेष में हमने "कुछ" कर दिया तो फिर वही होगा जो प्रारब्ध में लिखा हुआ है । अगर उस परिस्थिति में हमने कुछ न करने का मानस बना लिया और वास्तव में कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं दी तो फिर आप प्रारब्ध की दिशा भी बदल देते हैं और ऐसा करने के लिए मंत्रों की महान ऊर्जा ही परम सहायक सिद्ध होती है ।

प्रश्नः इतना सब करेंगे तो फिर हमारा क्या रह गया? हमारी पहचान का क्या होगा, सामाजिक प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या हम सन्यासी हो जाएंगे? क्या गृहस्थी भी छोड़नी पड़ जाएगी?


यही एकमात्र सही सवाल है जो हमें अपने आपसे पूछना चाहिए कि फिर रह क्या जाएगा


देखिये प्रभु जी - समर्पण का मतलब ही यही है कि हमने अपने मन, विचार, कर्म, चिंतन, पुण्य, पाप, लोभ, मोह, अहंकार, तृष्णा और यहां तक कि यह शरीर भी गुरु को ही समर्पित कर दिया है ।


और यहां गुरु कौन है?


गुरु वो हैं जो हमारे अंतर में ही विराजमान हैं । हम उस गुरु को ही ये सब समर्पित करते हैं ।


तो फिर हम कौन हैं?


हम फिर कुछ रह ही नहीं जाते । जब सब कुछ ही गुरु को दे दिया तो फिर ये शरीर भी गुरु की अमानत बन जाती है । फिर ये शरीर भी गुरु का ही है । हम तो केवल निमित्त मात्र बन जाते हैं । फिर गृहस्थी भी यही रहेगी, नौकरी भी यही रहेगी, परिवार और समाज भी यही रहेगा यहां तक कि सारे कार्य भी वही रहेंगे, बस हम न रहेंगे । यहां केवल गुरु ही रहेंगे ।


फिर इस शरीर का क्या होगा?


ये शरीर तो अब गुरु की अमानत है । जब आपका किसी भी चीज पर कोई अधिकार नहीं रहेगा तो अपनी देह पर भी नहीं रहेगा, इसलिए अगर इस शरीर से कुछ कर सकते हैं तो केवल सेवा कर सकते हैं । तो सेवा ही कीजिए । फिर चाहे वह सेवा, परिवार की हो, समाज की हो या देश की हो, आपको अब केवल सेवा का ही अधिकार है ।


एक बार आप सेवा करना प्रारंभ तो करें, फिर आपके सारे कार्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी गुरु की है । फिर आपको समस्या से बाहर निकालना भी गुरु का ही काम है । आप अपने कर्जे किस प्रकार से भरेंगे वह भी गुरु का ही काम है । इसलिए चिंता न करिये, सेवा करिये, चिंता करने का काम अब गुरु का है, आपका नहीं ।


 

कुछ दिन पहले टेलीग्राम पर एक सेशन संपन्न हुआ था, कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुयी थी - मैंने उस परिचर्चा का एक हिस्सा यूट्यूब पर अपलोड कर दिया है, उसकी लिंक यहां शेयर कर रहा हूं । आप भी उस परिचर्चा का आनंद लीजिए :-)




 

आप सबको अपने जीवन में अपना अभीष्ट प्राप्त हो, प्रश्नों के समाधान मिलें और मन में अपार शांति भी प्राप्त हो, ऐसी ही सदगुरुदेव महाराज के श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना करता हूं ।


अस्तु ।

 


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