यंत्र विशेषांकः श्रीयंत्र एवं वास्तु कृत्या यंत्र
श्रवण भेद
आज हम इन दुर्लभ यंत्रों पर चर्चा करें, उससे पहले एक और महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करेंगे, जिसे भगवत् पार्षदों ने और, उसके बाद संत जनों ने श्रवण भेद का नाम दिया है ।
श्री भागवत महापुराण में एक कथा आती है धुंधकारी नामक प्रेत की । ज्यादातर लोगों ने ये कथा सुन रखी होगी । लेकिन इस कथा में जो रहस्य है, वह सभी लोग नहीं समझ पाते हैं । धुंधकारी अपने नीच पाप कर्मों के कारण प्रेत बन गया था और अपने भाई गौकर्ण जी को आकर परेशान कर रहा था । गौकर्ण जी बहुत ही सात्विक और विद्वान ब्राह्मण थे । धुंधकारी की मृत्यु के बाद उसका गया में श्राद्ध भी कर आये थे । लेकिन विचार करिये कि गया में पूर्ण विधि विधान से श्राद्ध करने के बाद भी धुंधकारी को मुक्ति नहीं मिली । अपनी मुक्ति के लिए वह गौकर्ण जी के सामने कभी भैंसा बनकर घूमे, कभी बंदर, कभी कुछ - कभी कुछ । गौकर्ण जी यह देखकर विस्मित थे कि यह आखिर है कौन? जल को अभिमंत्रित करके उस प्रेत पर छिड़का तो उसको बोलने की शक्ति मिली । गौकर्ण जी के पूछने पर धुंधकारी ने बताया कि वह उनका ही भाई धुंधकारी है । गौकर्ण जी ने कहा कि मैं तो तुम्हारा गया में श्राद्ध करके आ रहा हूं, फिर तुमको मुक्ति क्यों नहीं मिली?
धुंधकारी ने बताया कि उसने जीवन में इतने पाप किये हैं कि अगर उसका गया जाकर एक हजार बार भी श्राद्ध किया जाए तब भी उसे मुक्ति नहीं मिलेगी ।
सुबह उठकर संध्यादि से निवृत्त होकर गौकर्ण जी ने इसी प्रश्न को भगवान सूर्य से किया । भगवान सूर्य की रश्मियों से उनको स्पष्ट उत्तर भी प्राप्त हुआ - "अगर संकल्पबद्ध होकर भागवत महापुराण का अनुष्ठान किया जाए तो धुंधकारी को मुक्ति मिल सकती है" ।
गौकर्ण महाराज ने अपने घर पर ही भागवत महापुराण का अनुष्ठान करने का संकल्प किया । एक अन्य ब्राह्मण को यजमान बनाकर भागवत का अनुष्ठान शुरु हो गया । उस गांव में एक भी व्यक्ति, स्त्री या बच्चा ऐसा नहीं था जो उस कथा को सुनने नहीं गया था । सात दिन के इस अनुष्ठान में गांव के प्रत्येक व्यक्ति ने समय से श्रद्धाभाव से युक्त होकर श्री भागवत महापुराण का श्रवण किया ।
धुंधकारी भी वहां कथा श्रवण करने आ गया । वह वायुरूप तो था ही, आंगन में ही एक बांस गड़ा था, उसी बांस में जाकर बैठ गया । उस बांस में सात गांठें थीं, तो वह सबसे पहली गांठ में ही जाकर बैठ गया । भागवत महापुराण कथा का एक - एक दिन गुजरता गया, एक - एक गांठ फटती रही और अंत में सातवें दिन जब सातवीं गांठ भी फट गयी तो धुंधकारी स्वयं चतुर्भुज स्वरूप हो गया । ये चतुर्भुज स्वरूप भगवान का ही रूप है । भगवान के पार्षद विमान लेकर धुंधकारी को लेने आये थे ।
धुंधकारी ने श्रद्धाभाव से गौकर्ण जी को प्रणाम किया और अपना आभार व्यक्ति किया कि भईया, तुम्हारे बिना मेरी सदगति होना संभव नहीं था । आज आपने मुझे मुक्ति दिलाकर मुझ पर बहुत उपकार किया है ।
लेकिन गौकर्ण जी के मन में कुछ और ही प्रश्न था । उन्होंने भगवत पार्षदों से पूछा कि कथा तो सभी ने सुनी है लेकिन मुक्ति केवल धुंधकारी की ही हुयी । ऐसा अंतर किसलिए भगवन?
भगवद पार्षदों ने कहा कि ऐसा श्रवण भेद की वजह से हुआ है । धुंधकारी ने केवल कथा सुनी ही नहीं बल्कि उस पर चिंतन, मनन भी किया । दिन भर की कथा पूरी होने के बाद भी उसका चित्त कभी किसी सांसारिक विषय में नहीं उलझा बल्कि वह पूरी रात - रात भर केवल यही चिंतन करता कि भगवान का स्वरूप कितना सुंदर है, भगवान के गुण कितने सुंदर हैं । वह यही सोचा करता कि कब अगली सुबह होगी, कब फिर से कथा शुरु होगी और कब मैं भगवान के उन दिव्य गुणों के बारे में और भी जान सकुंगा ।
भागवत में तो इस पर विस्तार से चर्चा की गयी है कि धुंधकारी का चिंतन किस प्रकार का था कि उसे मात्र सात दिनों में ही मुक्ति मिल गयी ।
तो क्या बाकी लोगों ने कथा नहीं सुनी थी?
अवश्य सुनी थी ।
तो अंतर कहां आ गया?
ये अंतर आया उस चिंतन के कारण जो कथा सुनते समय और दिन भर की कथा पूरी होने के बाद का रहा । गांव के बाकी लोग कथा सुनते समय भी सांसारिक कार्यों का चिंतन करने लग जाते थे । किसी को गाय को चारा डालना बाकी रह गया था, किसी को जंगल से लकड़ी लानी थी, किसी के कपड़े सूख रहे थे, किसी को वापस जल्दी से लौटकर भोजन बनाना था । ऐसे ही न जाने कितनी सांसारिक विषय वस्तु रहतीं जो उनको उस समय कथा से विमुख कर देतीं । मन कथा भी सुनता और सांसारिक कार्यों की याद भी दिलाता रहता ।
आप कहेंगे कि क्या इतने मात्र से मिलने वाले फल में अंतर आ जाता है?
तो इसका यही उत्तर भगवद पार्षदों ने दिया कि हां, श्रवण भेद से फल भेद में अंतर आ गया । इसी कारण से धुंधकारी तो मात्र सात दिनों में ही परम पद पा गया लेकिन बाकी गांव वालों को इतना उच्च कोटि का फल नहीं मिल सका ।
उसके बाद की कथा आप सभी को पता ही है कि गांव वालों ने श्री गौकर्ण जी को फिर से कथा सुनाने का अनुरोध किया, गौकर्ण जी ने फिर से उतने ही प्रेम से सबको कथा सुनायी, सात दिन तक सभी गांव वालों ने उस कथा और भागवत तत्व का खूब चिंतन मनन किया । फलस्वरूप सात दिन बाद भगवान स्वयं आये और गौकर्ण जी को गले लगा लिया । इस बार गांव के प्रत्येक जीव को संसार बंधन से मुक्ति मिली । पूरा का पूरा गांव ही खाली हो गया :-)
यही वह अंतर है जिसकी हम चर्चा आज करने वाले हैं । माध्यम भले ही श्री भागवत महापुराण की ये कथा है लेकिन इस विषय को आत्मसात करना बहुत ही महत्वपूर्ण है । जब हम साधना करते हैं तो -
क्या हमारा मन हमें इधर - उधर नहीं घुमाता रहता?
क्या हमें सांसारिक विषयों की चिंता व्याप्त नहीं रहती?
क्या हम वाकई निश्चिंत होकर गुरु के कथन पर अखंड विश्वास करके अपना मंत्र जप पूरा कर पाते हैं?
क्या हमारे मंत्र जप का उद्देश्य वास्तविक शांति प्राप्त करना है या अपने किसी सांसारिक कार्य की पूर्ति करना है?
क्या हमारा मन गुरु के चरणों में लग पाता है या हमको जबरदस्ती इसको गुरु की तरफ घुमाकर रखना पड़ता है?
क्या गुरु को याद करके हमारी आंखों में अश्रु आ पाते हैं या बस किसी मजदूर की तरह हम अपना मंत्र जप पूरा करने में लगे रहते हैं?
उद्देश्य क्या है हमारी साधना का?
अगर बाकी गांव वालों की तरह आप भी सोच रहे हैं कि मंत्र जप भी चलता रहेगा और साथ में सांसारिक चिंतन भी, तो इतना जान लीजिए कि फल तो अवश्य मिलेगा लेकिन वह केवल आपकी मजदूरी का मिलेगा । मंत्र जप तो एक अलग ही चिंतन है । उसका वास्तविक फल तो परमात्मा की प्राप्ति है । हम लोगों ने परमात्मा को गुरु रूप में धारण किया है तो हमारे लिए मंत्र जप का वास्तविक उद्देश्य गुरु की प्राप्ति है ।
अब आप फिर से वही सवाल न पूछने लग जाना कि क्या कामना की पूर्ति के लिए मंत्र जप करना उचित नहीं है । ऐसे सभी लोगों के लिए ही मैं ज्योतिष के सेशन करता हूं ताकि आपको समझ आ सके कि जीवन में जो भी मिलना है वह प्रारब्ध ने पहले ही तय कर दिया है । अगर मिलना होगा तो उसके लिए माला करने की आवश्यकता नहीं है । और अगर नहीं मिलना है तो आप चाहें एक करोड़ माला जप कर लें, नहीं मिलेगा । यही प्रारब्ध की शक्ति है ।
लेकिन अगर, आपके मन में गुरु के चरणों के प्रति भक्ति है, विनम्रता है, श्रद्धा है, और सबसे बढ़कर अपनी दैनिक साधना को पूरी करने की ललक है तो गुरु आपको वह भी दे सकते हैं जो आपके प्रारब्ध में नहीं था । इसलिए साधना करिये और अपने चिंतन और मनन पर ध्यान दीजिए - इस चिंतन - मनन में इतनी शक्ति है कि वह आपको इस भव सागर से पार करने में सहज ही मदद कर सकती है ।
श्रीयंत्र एवं वास्तु कृत्या यंत्र
आजकल बाजारों में श्रीयंत्र की भरमार है । जहां देखो उसी रंग का श्रीयंत्र उपलब्ध है और चाहे जिस आकार में । यहां तक कि लकड़ी के 3D में भी श्रीयंत्र उपलब्ध है, और तो और, शोपीस वाले भी श्रीयंत्र आपको इंटरनेट पर बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाएंगे ।
श्रीयंत्र भगवान शिव द्वारा प्रदत्त विद्या है और इसके लिए कहा जाता है कि घर में श्रीयंत्र की स्थापना करना पर्याप्त है । घर में अगर मंत्र सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र मौजूद हो तो भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति स्वयं ही होने लग जाती है ।
लेकिन क्या व्यावहारिक रूप में ऐसा हो पा रहा है ?
मेरे पास भी बाजार से खरीदे हुये कुछ श्रीयंत्र मौजूद हैं लेकिन मुझे तो ऐसा कुछ प्रभाव समझ नहीं आया । वैसे, कभी चिंतन करने का अवसर भी नहीं मिला । लेकिन कुछ माह पूर्व सदगुरुदेव महाराज की प्रेरणा और आज्ञा से इस विषय पर चिंतन करने का सौभाग्य मिला । वरिष्ठ गुरुभाई श्री मनीष जी ने भी इसमें अपने विचार रखे - श्रीयंत्र के त्रिकोणों की दिशा और स्थिति पर उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण चिंतन प्रदान किया । चिंतन तो मिल गया लेकिन अब चुनौती इसको मूर्त रूप प्रदान करने की थी ।
हमारे अनुज हैं तेज प्रताप सिंह, अलीगढ़ से ही हैं । उन्होंने डिजाइन उपलब्ध करायी । अब इस डिजाइन को मूर्त रूप कैसे प्रदान करें , ये बड़ा यक्ष प्रश्न था । तेज प्रताप ही एक वीडिओ भी लेकर आये और ये वीडिओ था उत्तरी आयरलैंड के जैक कोर्विन का । उसने अपने वीडिओ में श्रीयंत्र से जुड़ी बहुत बारीक जानकारियां दे रखी थीं और किस प्रकार से मात्र पेंसिल, परकार (कंपास) और स्केल की मदद से ही श्रीयंत्र को बनाया जा सकता है । श्रीयंत्र की संरचना इतनी जटिल है कि एक महीना तो केवल इसकी डिजाइन को ही समझने में लग गया । कितने गोले, लाइनें, कोण, त्रिकोण और भी न जाने क्या - क्या ।
अब हाथ से बनाने की अपनी जटिलतायें हैं, एक भी गलती हो जाए तो फिर से दूसरा श्रीयंत्र अलग ही बनाना पड़ता था । ऐसा न जाने कितनी बार हुआ और फिर, करीब चार महीने के अभ्यास के बाद पहला प्रारूप बन गया लेकिन सभी त्रिकोण आपस में सीधे ही नहीं हो पा रहे थे । कारण यही था कि पेंसिल की अपनी सीमा है । एकाध मिली मीटर भी इधर उधर हो ही सकता है ।
तब सदगुरुदेव महाराज से प्रार्थना की 🙏
तो गुरुजी ने प्रेरणा दी कि इसको सॉफ्टवेअर से तैयार करो । मुझे अच्छी तरह याद है कि उसके बाद ही Corel Draw सॉफ्टवेअर पर काम करना शुरु किया था । ये सॉफ्टवेअर बहुत अच्छा है लेकिन इसके टूल्स का इस्तेमाल करना हर किसी के बस की बात नहीं है । मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि ये केवल सदगुरुदेव महाराज की कृपा और दया है कि मुझे इस सॉफ्टवेअर का इस्तेमाल करना बहुत ही तेजी से आ गया ।
अब श्रीयंत्र का बहुत ही सटीक डिजाइन तैयार है और इसको लेज़र से प्रिंट कराने पर कार्य चल रहा है । मैं आप सभी के साथ इन सभी चीजों की डिटेल्स शेयर करुंगा । ये जैक कोर्विन के तैयार किये हुए श्रीयंत्र से करीब 1000 गुना ज्यादा सटीक है । कारण भी यही है कि इस सॉफ्टवेअर पर किसी भी लाइन को करीब 1000 गुना बढ़ाकर देखा जा सकता है । किसी भी कोण को सटीकता से बनाया जा सकता है । इस डिजाइन के लिए मैंने जैक को धन्यवाद भी किया था । मैंने उससे पूछा था कि मैं उसके लिए क्या कर सकता हूं तो उसने यही कहा कि यह वीडिओ आप सभी के साथ शेयर कर दीजिए । इसीलिए इस वीडिओ की लिंक आपको इस पोस्ट के आखिर में मिल जाएगी । आप सब भी इस वीडिओ को देखकर श्री यंत्र को बनाने का स्वयं ही अभ्यास कर सकते हैं ।
इस बार श्री यंत्र के साथ - साथ तीन बहुत ही विशिष्ट यंत्र और तैयार किये जा रहे हैं -
१. कनकधारा यंत्र
२. नव निधि प्रदायक कुबेर यंत्र
३. वास्तु कृत्या यंत्र
ये यंत्र सदगुरुदेव महाराज की धरोहर हैं और मेरा पूरा विश्वास है कि इन यंत्रों को जब आप अपने साधना कक्ष में स्थापित करेंगे और उन पर निर्धारित साधनायें करेंगे, तब आपकी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति को आप स्वयं अपनी आंखों से देखेंगे ।
श्रीयंत्र नव निधि प्रदायक कुबेर यंत्र कनकधारा यंत्र वास्तु कृत्या यंत्र
इन यंत्रों का निर्माण संभवत इसी महीने में हो जाएगा । इनकी प्राण प्रतिष्ठा और चैतन्य संस्कार आगामी यज्ञ महोत्सव में होगी जो राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में 23 - 24 नवंबर, 2026 को संपन्न होगा ।
अगर आप इन यंत्रों को प्राप्त करना चाहते हैं तो इनके लिए निर्धारित राशि जमा करके, वेबसाइट पर ही अपने डिटेल्स अपडेट कर दीजिए । पुष्टि के लिए मुझे भी WhatsApp या Arattai (8979480617) के माध्यम से बता सकते हैं । मैं यंत्र से जुड़ी डिटेल्स अपडेट करने के लिए पेज को फिर से खोल रहा हूं जो इस महीने के आखिर तक चालू रहेगा ।
आप सबके जीवन में ज्ञान के साथ - साथ समृद्धि और श्री दोनों ही आयें, ऐसा ही सदगुरुदेव महाराज के श्रीचरणों में निवेदन करता हूं ।
अस्तु ।




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