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सौन्दर्य बोध विशेषांक - भाग ‌‌‌५ (अप्सरा साधनाओं में सफलता के सूत्र)

अप्सरा साधनाओं में सफलता के सूत्र


चिंतन


हम अप्सरा साधनाओं में सफलता के सूत्र विषय पर कई लेखों के माध्यम से चर्चा कर चुके हैं । लेकिन एक विषय अभी भी ऐसा है जिस पर कोई चर्चा नहीं हो पायी है और वह है कि हमारा चिंतन कैसा हो । ज्यादातर लोग अप्सरा और यक्षिणी का नाम सुनते ही एक अलग ही दुनिया में चले जाते हैं और सोचते हैं कि जीवन की जितनी भी कामनायें हैं, सब उसी के माध्यम से पूरी कर लेंगे । लेकिन वास्तविकता यही है कि ज्यादातर समय वे अपनी कामनाओं की नहीं, अपनी वासनाओं की पूर्ति के बारे में ही सोचते हैं ।


जरा सोचिये कि एक सामान्य स्त्री भी आपको देखकर आपके मनोभावों का पता कर सकती है तो क्या अपार शक्ति संपन्न अप्सरा और यक्षिणियां ऐसा नहीं कर सकेंगी । वास्तविकता तो यह है कि हम जैसे होते हैं, और चिंतन करते हैं, हमारे चारों ओर वैसा ही ऊर्जा क्षेत्र निर्मित हो जाता है । यदि यह सात्विक है तो यह न सिर्फ सामान्य जनों को आकर्षित करता है, बल्कि साधना संपन्न होने पर देव वर्ग को भी आकर्षित करने की क्षमता रखता है । इसलिए चिंतन हमेशा सात्विक रहना चाहिए ।


प्रश्न यह भी उठ सकता है कि हम साधना तो करते ही रहते हैं और धीरे - धीरे मन के विकारों को भी दूर कर ही रहे हैं तो अगर मन में नकारात्मकता, अविश्वास, संदेह, वासनायें मौजूद रह जाएं तो क्या साधनाओं में सफलता नहीं मिल सकेगी?


इस प्रश्न का विवेचन करें, उससे पहले जरा एक बार ये सोचकर देखिए कि क्या वास्तव में हम अपने मन के विकारों पर काम कर भी रहे हैं या नहीं । ऐसा इसलिए को जो भी व्यक्ति गुरु मंत्र का जप करता है, वास्तव में उसके मन के विकार तो स्वयं ही दूर होने लग जाते हैं । गुरु मंत्र की शक्ति तो मन में विकारों को हमेशा हटाती ही रहती है, इसलिए मन का लगातार विकारमुक्त होते रहने की प्रक्रिया अगर जारी है तो चिंता की कोई बात नहीं है । और, इस बात को आपके अलावा दूसरा कोई व्यक्ति बता भी नहीं सकता । लेकिन अगर ये प्रक्रिया भी नहीं चल रही है और हम इन तीव्र और विलक्षण साधनाओं में उतर जाएं और फिर सफलता न मिलने को लेकर शिकायत करें तो कौन आपकी बात सुनेगा ।


जरा चिंतन करके देखिए कि दूध को फाड़ने के लिए नींबू की एक बूंद ही पर्याप्त होती है तो हमारे द्वारा की गयी साधना अगर हमारे ही किसी विकारयुक्त चिंतन से ही नष्ट हो गयी तो इसमें कौन सी बड़ी बात है ।


यही कारण है कि अपना चिंतन स्वस्थ रखना चाहिए, अश्लील साहित्य और फिल्मों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए, अनावश्यक वार्तालाप, निंदा, आलोचना इत्यादि से बचना चाहिए और अपने खाली समय का उपयोग कुछ सीखने में या भगवान की कथाओं को सुनने में प्रयोग करना चाहिए । इससे मन - बुद्धि शुद्ध होती है और साधनात्मक भावभूमि भी दृढ़ होती है ।


साधना से संबंधित मंत्र


मंत्र का चयन कभी भी खुद से नहीं करना चाहिए । मंत्र हमेशा गुरु मुख से ही प्राप्त करना चाहिए । गुरु मुख से प्राप्त मंत्र पूरी तरह से चैतन्य और किसी भी कीलन से मुक्त होते हैं और तत्काल प्रभाव दिखाने में सक्षम होते हैं । वैसे रहस्य ये भी है कि गुरु अगर स्वयं अपनी मर्जी से कोई मंत्र देते हैं तब उस मंत्र से जुड़े प्रभाव ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं में भी हस्तक्षेप करने की क्षमता से युक्त होते हैं ।


जिन साधकों को गुरु स्वयं मंत्र प्रदान करते हैं, उनके सौभाग्य की तुलना किसी से की भी नहीं जा सकती है और सच्चाई ये भी है कि इस स्थिति तक पहुंचते - पहुंचते गुरु उस शिष्य को इतना विवेक भी प्रदान कर देते हैं कि वह किसी हस्तक्षेप की बात भी नहीं सोच सकता । आखिरकार शक्ति मिलती ही उसे है जो उसे संभाल सकता है ।


हालांकि कभी - कभी समयाभाव के कारण गुरु के श्रीचरणों में जाने का सौभाग्य नहीं मिल पाता है और मन में किसी साधना को करने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो, तब गुरु द्वारा निर्देशित या लिखित ग्रंथ में वर्णित साधना और मंत्र का आश्रय लेना चाहिए, गुरु चरणों में मानसिक आज्ञा के लिए निवेदन करना चाहिए और उसके बाद ही साधना में बैठना चाहिए ।


मंत्र पुनश्चरण


किसी भी साधना का पुनश्चरण का मतलब है कि जैसा गुरु निर्देशित करें, उतनी संख्या में मंत्र जप किया जाए और विशेष प्रक्रिया का पालन करते हुये किया जाए । विशेष प्रक्रिया से तात्पर्य यहां पुनश्चरण के उन महत्वपूर्ण अंगों से है जो किसी भी साधना में सफलता प्रदान कर सकते हैं यथा -


  1. मंत्र जपः अपने इष्ट या काम्य देव शक्ति का पूजन पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से करके, निर्धारित मात्रा में मंत्र जप करना ।

  2. भूमि शोधनः साधना कक्ष के स्थान का पूजन भूमि शोधन कहलाता है । द्वार देवताओं का पूजन करके, धरती को अर्घ्य प्रदान करें, फिर आसन शोधन मंत्र से भूमि पर पुष्प, अक्षत आदि अर्पित करें और उस पर आसन बिछाकर बैठ जाएं । दैनिक साधना विधि पुस्तक में आपको भूमि शोधन की प्रक्रिया शुरु में ही मिल जाएगी ।

  3. देह शोधनः प्राणायाम संपन्न करके, भूत शद्धि न्यास, अपना इष्ट मंत्र, ऋष्यादिन्यास, करन्यास आदि संपन्न करने से शरीर शुद्ध हो जाता है ।

  4. द्रव्यशोधनः ये एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया है । समयाभाव के कारण आज तक प्रकाशित नहीं किया जा सका है लेकिन आज इसकी प्रक्रिया भी इसी लेख का हिस्सा रहेगी ।

  5. माला संस्कारः अप्सरा - यक्षिणी साधनाओं से संबंधित माला तैयार करने की विधि पहले ही प्रकाशित कर दी गयी है । वैसे भी मंत्र जप में संस्कारित माला ही प्रयोग करनी चाहिए । बिना संस्कार की हुयी माला प्रयोग करने से जीवन में तनाव और गृह कलेश भी संभव है । इसलिए भूलकर भी बिना संस्कार की माला का प्रयोग नहीं करना चाहिए । इसके अलावा, प्रयास यही करना चाहिए कि संपूर्ण साधना काल में अखंड दीपक जलता रहे । अगर ये संभव न हो तो इतना प्रयास अवश्य करना चाहिए कि जब तक मंत्र जप चलता रहे, कम से कम उतने समय तक दीपक बुझने न पावे ।


मंत्र पुनश्चरण के इन ५ अंगों के अलावा कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जो कि सामान्य साधकों को परेशान करते हैं, इसलिए उन पर भी आज चर्चा करते हैं -


हवन या होमः वैसे तो पूरा अनुष्ठान करके ही दशांश संख्या का हवन किया जाता है लेकिन अगर आप नित्य प्रतिदिन के मंत्र जप के दशांश का भी हवन कर सकें तो वह भी स्वीकार्य है । देखा जाए तो आप कहीं बेहतर स्थिति में होंगे । ऐसा इसलिए कि हवन करने से मंत्र दीप्त होते हैं और उनमें विशेष चैतन्यता आ जाती है ।


तर्पणः हवन करने के बाद बड़े से तांबे के बर्तन में या किसी सरोवर (तालाब) में हवन की आहुतियों के दशांश हिस्से का तर्पण करें । मतलब अगर आपने अगर ५० माला मंत्र जप किया था तो इसका दशांश अर्थात ५ माला के बराबर आप हवन या होम करेंगे । और उसका दशांश अर्थात ५० बार तर्पण करेंगे । तर्पण करने के लिए बर्तन को अष्टगंध, कपूर, दूर्वा आदि मिश्रित जल से भर लें और जो भी देवी या देवता हो, उसका नाम लेकर तर्पयामि नमः कह कर जल अर्पित करें ।


Kumbha Mudra
कुंभ मुद्रा

मार्जनः तर्पण के बाद उसकी दशांश संख्या में सरोवर में खड़े होकर अपने सिर पर दूर्वा द्वारा कुम्भ मुद्रा से देवता का नाम लेकर अभिषिंचामि नमः कहकर जल का अभिषेक करें । तो, अगर आपने ५० बार तर्पण किया है तो आप मात्र ५ बार मार्जन करेंगे ।


कुंभ मुद्रा बनाने के लिए आप दायें अंगूठे को बांये अंगूठे से लगाकर बाकी उंगलियों को मुट्ठी की भांति नीचे - ऊपर लगा दें तथा मुट्ठी को पोला रखें । कुंभ मुद्रा को ही कलश मुद्रा भी कहा जाता है ।


साधना के अंतिम दिवस ब्राह्मण भोज और कुमारी भोज अवश्य करना चाहिए ।


इसके बाद अपनी साधना की पूर्णता के लिए सदगुरुदेव महाराज के श्रीचरणों में प्रार्थना करनी चाहिए । यदि कोई साधक - साधिका इस प्रकार से क्रम को अपनाता है तो निश्चय ही अनुकूलता प्राप्त होती है ।


किन स्थानों पर साधना करने से अप्सरा - यक्षिणी साधनाओं में सफलता मिलती है?


इन साधनाओं को यथा संभव पवित्र स्थानों पर ही संपन्न करना चाहिए । अप्सरा - यक्षिणी साधनायें बहुत उच्च कोटि की मानी जाती हैं और ये साधनायें तीव्र भी होती हैं इसलिए इनको संपन्न करने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए जिनकी ऊर्जा का स्तर अच्छा होता है । उदाहरण के लिए आप गुरुधाम में आज्ञा लेकर साधना कर सकते हैं । गुरुधाम एक ऐसी जगह हैं जहां सदगुरुदेव महाराज ने लाखों शिष्यों को हजारों साधनायें करायी हैं, लाखों - करोड़ों मंत्र वहां जप किया जा चुका है, इसलिए वहां साधना करना आपका सौभाग्य होगा ।


गुरुधाम के अलावा आप सिद्ध पीठ, पवित्र नदियों के तट पर, किसी सुरम्य पर्वत के शिखर पर, किसी वन में एकांत में, बेल, बरगद अथवा पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर भी संपन्न कर सकते हैं । करें कहीं भी, एकांत अवश्य होना चाहिए । शहर के बीच में भी पीपल के पेड़ मिल जाते हैं, लेकिन वहां साधना करना उचित नहीं रहता । कारण यही है कि शहरों में एकांत नहीं मिल पाता ।


इसके अलावा अगर आप माता कामाख्या के मंदिर प्रांगण में इन साधनाओं को संपन्न करना चाहें तो भी श्रेष्ठ है । वहां आपका मंदिर प्रांगण में ही अनेक साधक यत्र - तत्र मंत्र जप करते हुये मिल जाएंगे । माता कामाख्या के मंदिर प्रांगण में ही एक सौभाग्य कुंड बना हुआ है ।


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