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सन्यासी और योगिनी

Updated: Sep 2, 2023

आवाहन - भाग 8

गतांक से आगे...


संन्यासी की सांसे अभी भी फूली हुयीं थीं…योगिनी के अट्टहास से वातावरण में चारों तरफ खौफ फैल गया था । संन्यासी को देखते हुए योगिनी ने कहा, तुमको यहां पर आना ही था वरना, मेरी पराकेशी साधना कैसे सिद्ध होती…। मुझे ज़रूरत थी एक अक्षत कौमार्य युक्त पुरुष की, जिसके साथ मैथुन के बाद मेरी साधना पूर्ण हो जाएगी। अगर तुम अपनी मर्जी से मुझे सहयोग दोगे तो शायद बच जाओगे, नहीं तो, मैं अपना उद्देश्य तो पूर्ण कर ही लुंगी, साथ ही साथ तुम्हारी बलि भी दे दुंगी…। योगिनी की सफ़ेद आँखें अब खूनी लाल हो चुकी थीं…।


संन्यासी भय के मारे अंदर से कांप उठा। उसने इस प्रकार की साधनाओं के बारे में सुना था।

यौन मत एक अलग ही साधना पद्धति है, इस साधना के अंतर्गत साधक को अपनी साधना पूर्ति के लिए अक्षय यौवना नारी जिसका कौमार्य भंग न हुआ हो उसके साथ मंत्र जाप के बाद मैथुन करना अनिवार्य है, इसके विपरीत साधिकाओं को अक्षत कौमार्य युक्त पुरुष के साथ मैथुन करना अनिवार्य है।

इसी मत के अंतर्गत पराकेशी साधना भी होती है जिसे सिद्ध करने के बाद साधक एक ऐसी विशिष्ट सिद्धि प्राप्त कर लेता है जिससे उम्र का या काल का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता है, ऐसे साधकों को अन्य लोक लोकान्तरों में जाना सुलभ हो जाता है और पूरे ब्रह्मांड में दृष्टि मात्र से किसी को भी अपना गुलाम बनाया जा सकता है ।


संन्यासी को ये भी पता था कि अधिकांश विवरणों में ये जाना गया है कि जिसके साथ मैथुन किया जाता है उसकी बलि हो जाती है।


संन्यासी ने बचाव के लिए वीर आवाहन शुरू किया लेकिन एक क्षण मात्र में योगिनी स्तंभन व कीलन प्रयोग कर चुकी थी। सन्यासी अब कुछ भी प्रयोग नहीं कर सकता था क्योंकि उसकी सारी सिद्धियां स्तंभित हो चुकी थी और वह क्षेत्र कीलित।


संन्यासी के पास अब कोई रास्ता नहीं बचा था।


लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी, और वह पद्मासन में बैठ गया। योगिनी का चेहरा खिल उठा, उसने सोचा कि संन्यासी साधना में सहयोग देने के लिए तैयार हो गया है। लेकिन नहीं, संन्यासी के पास एक और रास्ता बचा हुआ था। उसने दिव्य मंत्र से स्व-आवाहन किया और शवासन में लेट गया। योगिनी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि संन्यासी आखिर कर क्या रहा है किन्तु वह अपने कीलन प्रयोग के बाद निश्चिंत थी।


सब से पहले उसने अपनी प्राण ऊर्जा का विखंडन किया, और उसके बाद अपने स्थूल शरीर से उसने सूक्ष्म शरीर को अलग कर लिया। योगिनी अभी भी मुस्कुरा रही थी, वह संन्यासी के सूक्ष्म शरीर को देख सकती थी जो कि रज्जतरज्जू से उसके स्थूल शरीर से जुड़ा हुआ था। योगिनी ने तारक तन्त्र का प्रयोग किया जिससे किसी को भी सूक्ष्म शरीर से अपने स्थूल शरीर में वापस आने के लिए बाध्य होना पड़ता है।


लेकिन सन्यासी ने कुछ और ही सोचा था, उसने अपने सूक्ष्म शरीर को निष्क्रिय कर दिया और सूक्ष्म शरीर से एक ओर शरीर को निकाल दिया जो कि अब कारण शरीर था…

 

सन्यासी के कदम तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे। शाम घिरने को थी और तब तक सन्यासी पहुंच चुका था अपनी मंजिल तक। एक छोटा सा क़स्बा था, जिसमें कुछ कच्चे और कुछ पक्के मकान बने हुए थे। कोई आम छोटे गांव की तरह ही वह था, नगर से थोड़े दूर सन्यासी के कदम रुके और उसने देखा उस जगह को जिसके बारे में उसने न सिर्फ अघोरी से, बल्कि कई और लोगों से भी सुना था..।


सालों से होती आ रही तीक्ष्ण साधनाओं का गढ़, जिसे एक समय चिरकूट कस्बा भी कहा जाता था, लेकिन आज ये बहुत बदल चुका है, यहां तक कि नाम भी। झोंपड़ियों की जगह ले ली है नए मकानों ने, इंसानों को इस बसाहट की पहले के विवरणों से जैसी भयंकर कल्पना मन में होती थी अब ऐसा नहीं है। सब बदल सा गया है।


यही सब देखकर सन्यासी ने सोचा था कि शायद यहां की योगिनियां लुप्त हो गयी हैं और साथ ही साथ अब (शायद) यहां पर उनकी मायावी साधनाएं भी नहीं रह गयीं हैं…।


डर के मारे कई सालों तक यहां पर कोई नहीं आया और किसी को पता भी नहीं चला कि ये तो अब एक आम गांव की तरह ही बन गया है। मुस्कान के साथ वह आगे बढ़ा, गांव के बाहर ही उसने रात बिताने का निर्णय किया लेकिन फिर कुछ सोचता हुआ सा गांव के अंदर जाने लगा।


रास्ते में ही एक व्यक्ति ने उसे रोक कर प्रणाम किया और बैठने का आग्रह किया। कुछ देर बैठने के बाद सन्यासी ने रुकने की जगह की चिंता जताई। साथ के व्यक्ति ने कहा," यहां पर कई परिवार सन्यासी को अपने घर में आसरा देना अपना सौभाग्य समझते हैं"। आप चलिए, मैं आपकी व्यवस्था कर देता हूं…इसी के साथ वह व्यक्ति उठा और एक तरफ आगे बढ़ गया… ।


सन्यासी भी उसके पीछे-पीछे चल पड़े।


थोड़ी दूर पर ही एक कच्चा मकान बना हुआ था, व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि एक कमरा थोड़ी ऊंचाई पर बना हुआ था जो कि घर से थोड़ा अलग था और, वहां जाने का रास्ता भी अलग ही था। जो व्यक्ति उन्हें यहां लाया था, वह उसी कमरे के दरवाज़े के पास रुका और थोड़ा सा किवाड़ खोल के सन्यासी को कहा कि आपकी व्यवस्था यहीं हो जाएगी।


सन्यासी ने अभिवादन में एक स्नेह युक्त मुस्कान से उस व्यक्ति की ओर देखा। वह व्यक्ति किवाड़ से दूर हो गया और सन्यासी अब दरवाज़े के बिलकुल पास आ गए।


दरवाज़े पर हाथ लगते ही एक तेज़ हवा ने उनको कमरे में धकेल दिया और दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया…सन्यासी इसके लिए तैयार नहीं था हड़बड़ाहट में वह दरवाज़े की ओर भागे लेकिन वापस उन्हें किसी ने खींच लिया…। सन्यासी ने कमरे में पीछे मुड़कर देखा…दिए की पतली सी रोशनी में जो कुछ भी दिखाई दिया, उससे सन्यासी के दिल की धड़कन थम सी गई।


छोटा सा हवन कुंड, उसके पास नुकीला त्रिशूल गड़ाया हुआ, आस पास कुमकुम, हल्दी और न जाने क्या-क्या पदार्थ बिखरे थे, शराब की खाली पड़ी बोतल, नर-मुंड, उफ़ और इस सब के बीच में एक आसान पर वीरासन में बैठी हुई २५-२६ वर्ष की अत्यधिक सुन्दर योगिनी।


उसने एक लाल रंग का चोगा लपेटा हुआ था जिसमें से उसके कमनीय बदन का अत्यधिक गोरा रंग साफ़ नज़र आ रहा था, खूबसूरती को वह मुट्ठी में बांधे हुई थी। कपाल पर अत्यधिक लंबा सिंदूर का लाल तिलक। ध्यानस्थ मुद्रा में बैठी हुई उस कोई काल्पनिक मूरत सी उस रूपसी ने अपनी आंखें धीरे से खोली और सन्यासी को देख के मुसकुरा दी …।


सन्यासी अभी भी सदमे में ही थे, निश्चय ही वह व्यक्ति जिसने उसे यहां छोड़ा था, इस योगिनी से परिचित है और मुझे षड्यंत्र में फंसा कर यहां लाया गया था, मगर किस लिए? तभी उस रूपसी ने अट्टहास किया जैसे कि वह सन्यासी की मूर्खता पर व्यंग कर रही हो। सन्यासी के लिए तो काटो तो खून नहीं सी स्थिति हो गयी । यही सोचकर कि पता नहीं अब आगे उसका क्या होगा..???


(क्रमशः)

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