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सूक्ष्म शरीर का आवाहन

Updated: Sep 2, 2023

आवाहन - भाग 10

गतांक से आगे...


संन्यासी के साथ आगे बढ़ते हुए मैं उसकी आपबीती के बारे में जान रहा था….। रास्ता अब बीहड़ न होकर कुछ हरभरा हो गया था…। संन्यासी ने दुखी और भग्न ह्रदय से अपने दुःख के बारे में बताया, ज़ाहिर है कि इस वक्त वह मेरे साथ अपने कारण शरीर में थे । महीनों से ये यूं ही भटक रहे हैं।


मेरे साथ आए दूसरे व्यक्ति के बारे में मैंने जाना कि वह अघोर साधनाओं में निष्णात हैं। उग्र साधनाओं में उनको ज़बरदस्त महारत हासिल है । मैंने उनको एक बार फिर से देखा, थोड़ा गौर से…सामान्य कद काठी, उम्र होगी कोई ४० के आसपास या उससे भी कम, हलकी सी मूँछें, कोई विशेषता नहीं लेकिन, उनकी आंखें अत्यधिक लाल थीं। मुझे पता चला कि वह मेरे ही गुरु भाई हैं और उन्होंने यह सब सिद्धियां सदगुरुदेव निखिलेश्वरानंदजी से ही प्राप्त की थीं । वे सद्गृहस्थ हैं और अपने परिवार के साथ ही रहते हैं ।


संन्यासी ने कोई रास्ता बचा न देख अपने गुरु से संपर्क किया था, उनके गुरु ने श्री निखिलेश्वरानंदजी को संन्यासी की समस्या से परिचित कराया, तब निखिलेश्वरानंदजी ने मेरे साथ आ रहे इन सद्गृहस्थ को संन्यासी की समस्या सुलझाने की आज्ञा दी थी।


अब दूर से ही कुछ नगर सा नज़र आ रहा था, संन्यासी ने एक जगह रुकते हुए कहा कि अब हम कस्बे की सीमा में दाखिल होने जा रहे है। संन्यासी ने एक कदम आगे बढ़ाया जिसके साथ ही साथ मैंने और मेरे साथ आए सज्जन ने भी आगे बढ़ना उचित समझा । लेकिन ज्यों ही मैं उस कस्बे की सीमा में दाखिल हुआ, मुझे बहुत ही अजीब सा महसूस हुआ और मैं रुक गया… ।


सन्यासी ने मेरी तरफ प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा……मैंने कहा कि मुझे कुछ अजीब सा लग रहा है…


संन्यासी ने मेरी तरफ अजीब ढंग से देखा और किंचित मुस्कराहट के साथ कहा “क्योंकि यह तुम्हारा वास्तविक शरीर नहीं है, तुम अभी सूक्ष्म शरीर में हो”


हां……..और, मुझे जैसे सब कुछ समझ में आ रहा था… । आज सुबह जब मैं उठा तो शायद एक घंटे बाद ही मुझे जोरों से चक्कर आया था और अचानक अपने बिस्तर पर गिर पड़ा था। उसके बाद मैंने अपने आपको उस पथरीले मैदान पर पाया। मेरा निश्चित दिशा की तरफ जाना, असामान्य गति, सज्जन से मूक वार्तालाप, मनोभाव इत्यादि…। तो …..मैं अपने सूक्ष्म शरीर में हूं? लेकिन अगर मैं यहां पर आया भी तो कैसे?


यही सब सोच रहा था कि अचानक से संन्यासी ने मेरे मनोभाव को पढ़ते हुए मुझे कहा कि मुझे अपने गुरु से आप दोनों को यहां बुलाने की आज्ञा मिली थी, इन सज्जन को मैंने पहले ही बुला लिया था, आपके सूक्ष्म शरीर का मैंने आवाहन किया है…। जब सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर विलीन होता है तो वह सम्पूर्ण देह में, विभिन्न शरीर में भी प्राण एवं आत्म ऊर्जा रहती ही है……।


आवाहन के माध्यम से आपके सूक्ष्म शरीर को मैंने यहां पर खींच लिया है, आवाहन का अर्थ ही होता है बुलाना, अपनी और खींचना, आकर्षित करना…


आवाहन के इस पक्ष के बारे में मैंने कभी सुना भी नहीं था कि, किसी को भी, किसी भी शरीर में आवाहित किया जा सकता है…। सच में ज्ञान असीमित है…। लेकिन फिर मैं सोच में पड गया कि मेरा यहां आने का उद्देश्य क्या है?


तब उस सज्जन महोदय ने कहा कि वो मैं तुम्हें समय आने पर बता दुंगा फिलहाल हमें चलना चाहिए…।

इसी के साथ हम उस कस्बे की ओर चल पड़े..।


संन्यासी निश्चित गति से आगे बढ़ते जा रहे थे और हम कुछ पीछे - पीछे संन्यासी के कदमों पर बढे़ जा रहे थे। कस्बे में इधर - उधर कुछ लोग थे जो की शायद हमें देख नहीं सकते थे क्यूं कि हम अपने वास्तविक शरीर में नहीं थे…। आगे मैंने देखा कि संन्यासी ने योगिनी की जिस जगह का जिक्र किया था, कुछ उसी प्रकार की जगह हमें दिखाई दी…। कुछ ही दूरी पर वह मकान और, थोड़ा अलग हट कर थोड़ी ऊंचाई पर एक कमरा… । हम २५-३० कदम दूर रुक गए…संन्यासी ने मुझसे कहा कि अब तुम्हें यह सूक्ष्म शरीर छोड़ना होगा और कारण शरीर में आना होगा..। मैंने आश्चर्य से सन्यासी के सामने देखा…और पूछा कि कैसे?


सन्यासी ने उत्तर दिया संभव है, आवाहन से…


(क्रमशः)

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